व्यास उवाच तौ समुत्पन्नविज्ञानौ भगवत्कर्मदर्शनात् देवकीवसुदेवौ तु दृष्ट्वा मायां पुनर् हरिः //
यह प्रथम श्लोक ब्रह्मपुराण में पवित्र रूप से निर्दिष्ट है।