कृष्णो ब्रवीति राजार्हम् एतद् रत्नम् अनुत्तमम् सुधर्माख्या सभा युक्तम् अस्यां यदुभिर् आसितुम् //
194.15 का श्लोक-पाठ अनुपस्थित है; इसलिए अर्थानुवाद नहीं हो सकता। कृपया मूल पाठ दें।