श्रीकृष्ण उवाच गच्छेन्द्रं ब्रूहि वायो त्वम् अलं गर्वेण वासव दीयताम् उग्रसेनाय सुधर्मा भवता सभा //
194.14 का मूल संस्कृत श्लोक यहाँ दिखाई नहीं देता; इसलिए शास्त्रीय अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक लिखें।