तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी छित्त्वैतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानवः //
चौदहवें श्लोक में अध्याय का प्रवाह सूचित है; श्रद्धा से श्रवण हितकर है।