व्रणद्वाराण्य् अधिष्ठाय कर्माण्य् आत्मनि मन्यते श्रोत्रादीनि तु सर्वाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाण्य् अथ //
यह ब्रह्मपुराण का सप्तचत्वारिंशत्तम श्लोक है; मूल श्लोक का पाठ यहाँ नहीं दिया गया।