स एवं फलम् आप्नोति त्रिषु लोकेषु मूर्तिमान् प्रकृतिः कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् //
यह ब्रह्मपुराण का त्रिचत्वारिंशत्तम श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।