मनुष्यत्वाच् च निरयं पर्यायेणोपगच्छति एष एवं द्विजातीनाम् आत्मा वै स गुणैर् वृतः //
यहाँ ‘४०’ श्लोक-संख्या दी है; मूल पाठ न होने से अनुवाद संभव नहीं।