कोषकारो यथात्मानं कीटः समभिरुन्धति सूत्रतन्तुगुणैर् नित्यं तथायम् अगुणो गुणैः //
यहाँ चतुर्थ भाग शास्त्रीय अर्थ को समेटकर सत्कर्मों की प्रशंसा करता है।