निस्तर्तव्याण्य् अथैतानि सर्वाणीति नराधिप मन्यते पक्षबुद्धित्वात् तथैव सुकृतान्य् अपि //
यहाँ श्लोक-संख्या पैंतीस है; मूल पाठ के अभाव में अर्थ स्पष्ट नहीं होता।