प्रकृत्या सर्वम् एवेदं जगद् अन्धीकृतं विभो रजसा तमसा चैव व्याप्तं सर्वम् अनेकधा //
यहाँ श्लोक-संख्या तैंतीस निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।