यजनाध्ययने दानं तथैवाहुः प्रतिग्रहम् याजनाध्यापने चैव तथान्यद् अपि किंचन //
यहाँ श्लोक 27 निर्दिष्ट है; यह पुराण-वचन श्रवण, पठन और मनन से साधकों के हित का कारण बनता है।