उपाश्रयान् अप्य् अपरान् पाखण्डान् विविधान् अपि विविक्ताश् च शिलाछायास् तथा प्रस्रवणानि च //
इक्कीसवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसका तात्पर्य सदाचार को प्रवर्तित करने वाला और पापक्षय करने वाला है।