Mārkaṇḍeya Ṛṣi Tested by Indra and Blessed by Nara-Nārāyaṇa
प्राप्तद्विजातिसंस्कारो मार्कण्डेय: पितु: क्रमात् । छन्दांस्यधीत्य धर्मेण तप:स्वाध्यायसंयुत: ॥ ७ ॥ बृहद्व्रतधर: शान्तो जटिलो वल्कलाम्बर: । बिभ्रत् कमण्डलुं दण्डमुपवीतं समेखलम् ॥ ८ ॥ कृष्णाजिनं साक्षसूत्रं कुशांश्च नियमर्द्धये । अग्न्यर्कगुरुविप्रात्मस्वर्चयन् सन्ध्ययोर्हरिम् ॥ ९ ॥ सायं प्रात: स गुरवे भैक्ष्यमाहृत्य वाग्यत: । बुभुजे गुर्वनुज्ञात: सकृन्नो चेदुपोषित: ॥ १० ॥ एवं तप:स्वाध्यायपरो वर्षाणामयुतायुतम् । आराधयन् हृषीकेशं जिग्ये मृत्युं सुदुर्जयम् ॥ ११ ॥
prāpta-dvijāti-saṁskāro mārkaṇḍeyaḥ pituḥ kramāt chandāṁsy adhītya dharmeṇa tapaḥ-svādhyāya-saṁyutaḥ
पिता द्वारा विधिपूर्वक द्विजाति-संस्कार प्राप्त कर मार्कण्डेय ने क्रमशः वेद-मन्त्रों का अध्ययन किया और धर्मपूर्वक नियमों का पालन किया; तप और स्वाध्याय में युक्त होकर वे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहे। वे अत्यन्त शान्त, जटाधारी और वल्कल-वस्त्रधारी थे; कमण्डलु, दण्ड, यज्ञोपवीत और मेखला धारण करते, तथा कृष्णाजिन, रुद्राक्ष-माला और कुशा भी नियम-वृद्धि हेतु रखते। सन्ध्या-काल में वे अग्नि, सूर्य, गुरु, ब्राह्मण और हृदयस्थ परमात्मा—इन रूपों में हरि की नित्य आराधना करते। प्रातः-सायं भिक्षा लाकर मौनपूर्वक गुरु को अर्पित करते; गुरु की आज्ञा मिले तो दिन में एक बार भोजन करते, अन्यथा उपवास। इस प्रकार असंख्य युगों तक हृषीकेश भगवान् की उपासना करके उन्होंने अजेय मृत्यु पर विजय पाई।