Atharva Veda Anuvaka 9
Kanda 610 Suktas32 Mantras

Anuvaka 9

मुख्य विषय: प्राण-शक्ति और सामाजिक व्यवस्था का स्थिरीकरण—गर्भाधान और विवाह से लेकर रोग-निवारण तथा दृढ़ राजत्व तक। उपविषय: (1) गर्भाधान (गर्भाधान) और गर्भ/गर्भाशय की रक्षा। (2) जायाकामना—उचित पत्नी का आकर्षण और गृहस्थ-जीवन में समावेशन। (3) क्षयकारी रोगों (अपचितिः, यक्ष्मा) तथा आन्तरिक पीड़ा का निष्कासन। (4) निरृति (आपदा, अमंगल-लक्षण, बन्धनकारी दुर्भाग्य) से मुक्ति। (5) ध्रुव के द्वारा ‘स्थापन’/‘स्थिरीकरण’ की ब्रह्माण्डीय क्रिया से सार्वभौमत्व का पौष्टिक (पौष्टिक) सुदृढ़ीकरण। (6) प्रीति (स्नेह) का संवर्धन और शीतलता/शमन का साधन।

Suktas in Anuvaka 9

Sukta 81

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त गर्भाधान (गर्भ-स्थापन) तथा पुत्रकाम्य (संतान-प्राप्ति की कामना) का मंत्र है। इसका उद्देश्य गर्भाशय को स्थापित और सुरक्षित करना है, ताकि सक्षम भ्रूण का आरोपण हो सके और वह पूर्ण अवधि तक धारण होकर जन्म ले। इसमें परिहस्त—रक्षा-सीमा बाँधने वाली शक्ति—का आवाहन किया गया है, जो रक्षस् (हानिकारक प्राणी/प्रभाव) को दूर रखकर संतान-प्राप्ति और गृह-समृद्धि को सुनिश्चित करती है।

| 3 Mantras

Sukta 82

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त विवाह-आकर्षण (जायाकामना) है, जिसका उद्देश्य पाठकर्ता के जीवन और गृह में योग्य पत्नी को आकर्षित करना है। इसमें इच्छित मानवीय विवाह को दिव्य आदर्श-पूर्वापर से जोड़ा गया है—अश्विनों द्वारा सूर्याः का वधू-रथ पर ले जाना तथा इन्द्र की अजेय, धन-प्रद शक्ति—ताकि सौभाग्य, सहमति और सामाजिक सफलता एकत्र होकर वधू-प्राप्ति में परिणत हों।

| 3 Mantras

Sukta 83

यह संक्षिप्त भैषज्य सूक्त क्षयकारी व्याधि (अपचिति) को उसके आसन से “उड़ा कर” दूर भेजते हुए निष्कासित करता है और उसके प्रतिकार के रूप में सूर्य–चन्द्र की औषधि-शक्ति को पुनर्स्थापक बल के रूप में स्थापित करता है। यह (1) सजीव निष्कासन-चित्रण (रोग को बाहर हाँका गया पक्षी मानकर), (2) पुनरावृत्ति रोकने हेतु अनेक रोग-कारकों का नाम लेकर उन्हें मार्ग से हटाने, और (3) यज्ञाहुति-सूत्र द्वारा कर्म को सील कर अनुष्ठान की सिद्धि सुनिश्चित करने—इन उपायों से कार्य करता है।

Rishi: Atharvanic healer tradition (anonymous/collective) | Devata: Sūrya and Candramas (as healers); disease-personification (Apaciti) as target | 4 Mantras

Sukta 84

यह संक्षिप्त अथर्वणीय मंत्र ‘निरृति से विमोचन’ का उपक्रम है, जिसका उद्देश्य विपत्ति की शक्ति को दूर भगाना और उन बंधनों को काटना है जो पीड़ित को दुर्भाग्य, रोग या मृत्यु-सूचकों से बाँध देते हैं। निरृति के भयानक आसन में आहुति देकर, और उसके द्विरूप को—भूmi (सबको अपने में समाने वाली पृथ्वी) तथा निरृति (विघटनकारी निषेध)—के रूप में नाम लेकर, यह सूक्त लोहे के फंदों/पाशों को छिन्न करने के लिए बाध्य करता है और रोगी को जीवन में पुनः स्थापित करता है—या, यदि मृत्यु अपरिवर्तनीय हो, तो उसे यम और पितरों के सुपथ-आरोहण हेतु सुरक्षित रूप से सौंप देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (not specified in the provided excerpt) | Devata: Nirṛti (and implicitly Bhūmi as the receiving/covering power) | 4 Mantras

Sukta 85

अथर्ववेद 6.85 एक संक्षिप्त उपचार-मंत्र है, जिसका उद्देश्य यक्ष्म (क्षय/शोष) को बाहर निकालना और रोगी के चारों ओर रक्षात्मक ‘सीमा’ स्थापित करके उसकी पुनरावृत्ति को रोकना है। इसमें वनस्पति-शक्ति (वनस्पति के रूप में वराण) को दिव्य वाणी के अधिकार-बल (इन्द्र–मित्र–वरुण तथा समस्त देवगण) और अग्नि वैश्वानर की शुद्धि करने वाली, नियंत्रक उष्णता के साथ जोड़ा गया है। वृत्‍र द्वारा जलों को रोकने की मिथकीय उपमा को रोग के शरीर में फैलाव और गति को ‘रोकने’ के लिए साधन बनाया गया है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras rubric; specific r̥ṣi attribution requires pada-anukramaṇī confirmation) | Devata: Varana/Vanaspati as divine healer; secondarily ‘the Gods’ as expellers of yákṣma | 3 Mantras

Sukta 86

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त एक पौष्टिक “राज-स्थैर्य” मंत्र-प्रयोग है, जो सार्वभौम प्रभुत्व और पुरुष-प्रधान श्रेष्ठता को एक ही यज्ञीय विषय (प्रायः राजा) में संकेन्द्रित करता है। उसे ब्रह्माण्डीय अधिपत्यों के साथ समन्वित करके—इन्द्र की वृष-शक्ति, समुद्र का प्रवाहों पर अधिकार, अग्नि का पृथ्वी पर स्वामित्व, और चन्द्रमा का नक्षत्रों पर शासन—यह उसे एकवृष (“एकमात्र, अद्वितीय वृषभ”) बनाना चाहता है, अर्थात् ऐसा जिसके अधिकार और जनन-तेज में कोई समकक्ष या प्रतिद्वन्द्वी न हो।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (royal-stability corpus; specific r̥ṣi not marked in the provided excerpt) | Devata: Rājya/Sāmrajya (personified sovereignty) / the King as ritual subject | 3 Mantras

Sukta 87

यह संक्षिप्त राजकीय मंत्र राजा को दृढ़, अचल सार्वभौमत्व की परिधि में “घेर” देता है, ताकि राज्य हाथ से न फिसले और प्रजा स्वेच्छा से एकनिष्ठ बनी रहे। यह राजत्व को राजा को “पर्वत के समान” स्थिर करके, उसे इन्द्र के आदर्श पर ढालकर, और सोम तथा ब्रह्मणस्पति द्वारा अनुमोदित यज्ञीय ‘ध्रुव’ (अटल दृढ़ता) से इस कृत्य को मुहरबंद करके स्थापन करता है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (not specified in excerpt) | Devata: Rājya/Rāṣṭra (kingship/realm) personified; also the King as ritual focus | 3 Mantras

Sukta 88

यह संक्षिप्त पौष्टिक सूक्त राजत्व को ‘स्थिर’ करता है—शासक को आकाश, पृथ्वी और पर्वतों जैसे अचल विश्व-आधारों के साथ समन्वित करके—ताकि राज्य अडिग रहे। इसमें ध्रुव (अचलता/स्थैर्य) तथा सार्वभौम धारक वरुण, बृहस्पति, इन्द्र और अग्नि का आह्वान है, जिससे राष्ट्र स्थिर हो, शत्रु प्रतिद्वन्द्वी पराजित हों, और सभा तथा दिशाएँ एकमत हों।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (not specified in excerpt) | Devata: Dhruva (steadfastness) / Rājā (king) as ritual focus | 3 Mantras

Sukta 89

अथर्ववेद 6.89 प्रीति (स्नेह/सामंजस्य) उत्पन्न करने का एक संक्षिप्त अथर्वणीय गृह्य-आकर्षण-मंत्र है, जो साथ ही मनोदैहिक “हृदय-दाह” (हार्दि) और मानसिक पीड़ा को शुष्क/शांत करता है। यह सोम-समर्थित शक्ति को अनुष्ठानपूर्वक व्यक्ति—विशेषतः उसके शिर—में स्थानान्तरित करके, तथा वायु/धूम के बिम्ब को वाहक बनाकर कार्य करता है, जो दूसरे के मन को साधक की ओर खींच लाता है; और अंततः मित्र–वरुण तथा सरस्वती की साक्षी में सामाजिक रूप से मान्य मिलन पर समाप्त होता है।

Rishi: Atharvanic tradition (domestic charm corpus) | Devata: Prīti (affection) as functional devatā; Soma as empowering agent | 3 Mantras

Sukta 90

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक भैषज्य-स्तोत्र तीव्र आन्तरिक पीड़ा को रुद्र के ‘शर’ के रूप में देखता है, जो अंगों और हृदय में धँसा हुआ है, और मंत्र-बल से उसे बाहर खींचकर निष्प्रभावी करने का उपाय करता है। इसमें ‘उखाड़ने/खींच निकालने’ (वि वृह्-) की भाषा के साथ ‘धमनियों/नाड़ियों’ (धामनी-) के शोधन का भाव जुड़ा है। अंत में शर की उड़ान के प्रत्येक चरण में उसे बार-बार नमस्कार करके रुद्र को शान्त किया जाता है, ताकि वह पुनः न लौटे।

Rishi: Atharvanic tradition (often anonymous in AV; associated with Atharvan/Angiras healing corpus) | Devata: Rudra (as sender and, by appeasement, remover of the missile) | 3 Mantras

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