
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by converting sovereignty into routines: offices, inspections, records, and punishments. Chapter 2.22 belongs to the commercial-administration stream where the state treats the market as a revenue-engine and a security surface. The sutra directs that commodities (paṇya) be ‘established’ with śukla and atyayam ‘from apakāra.’ Read as policy, it mandates that goods entering sale be set up under standards of purity/wholesomeness (śukla) and protected from loss, spoilage, or injury to the public (atyaya/apakāra). The pragmatic objective is twofold: (1) protect consumers and the king’s reputation by suppressing adulteration and harmful merchandise; (2) stabilize taxable trade by reducing disputes, returns, and black-market incentives. Within the Saptāṅga, this hardens Kośa by aligning market order with coercive credibility: predictable enforcement produces predictable revenue, which sustains army, fortification, and diplomacy.
Sutra 1
बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यम् ॥ कZ_०२.२२.०१ ॥
बाहरी लोगों और राज्य के भीतर रहने वालों—दोनों को अतिथ्य (राज्य की सुविधा/सहायता) प्रदान की जानी चाहिए।
Sutra 2
निष्क्राम्यं प्रवेश्यं च शुल्कम् ॥ कZ_०२.२२.०२ ॥
निर्यात (बाहर जाने वाले माल) और आयात (अंदर आने वाले माल)—दोनों पर शुल्क लगता है।
Sutra 3
प्रवेश्यानां मूल्यपञ्चभागः ॥ कZ_०२.२२.०३ ॥
आयातित वस्तुओं पर उनके मूल्य का पाँचवाँ भाग शुल्क है।
Sutra 4
पुष्पफलशाकमूलकन्दवाल्लिक्यबीजशुष्कमत्स्यमांसानां षड्भागं गृह्णीयात् ॥ कZ_०२.२२.०४ ॥
फूल, फल, साग, जड़, कंद, लताएँ, बीज, सूखा माल, मछली और मांस आदि पर छठा भाग शुल्क लेना चाहिए।
Sutra 5
शङ्खवज्रमणिमुक्ताप्रवालहाराणां तज्जातपुरुषैः कारयेत्कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः ॥ कZ_०२.२२.०५ ॥
शंख, हीरा, रत्न, मोती, प्रवाल और हार आदि के लिए उसी शिल्प के विशेषज्ञों से काम कराए; और किए गए काम का—माप, समय, मजदूरी, उत्पादन और पूर्णता—आदि का लेखा रखे।
Sutra 6
क्षौमदुकूलक्रिमितानकङ्कटहरितालमनःशिलाञ्जनहिङ्गुलुकलोहवर्णधातूनां चन्दनागुरुकटुककिण्वावराणां चर्मदन्तास्तरणप्रावरणक्रिमिजातानामाजैडकस्य च दशभागः पञ्चदशभागो वा ॥ कZ_०२.२२.०६ ॥
सन, महीन कपड़ा, रेशम, टिन, ताम्र/कांस्य, हरताल, मनःशिला, अंजन, हिंगुल, धातु तथा रंगीन खनिज; और चंदन, अगरु, तीखे सुगंध-द्रव्य, किण्व (खमीर/किण्वित पदार्थ) आदि; तथा चमड़ा, दाँत (हाथीदाँत), बिछावन, ओढ़ने-बिछाने के आवरण, रेशम-कीट-उत्पाद और बकरी-भेड़ के उत्पाद—इन पर शुल्क दसवाँ भाग या पंद्रहवाँ भाग है।
Sutra 7
वस्त्रचतुष्पदद्विपदसूत्रकार्पासगन्धभैषज्यकाष्ठवेणुवल्कलचर्ममृद्भाण्डानां धान्यस्नेहक्षारलवणमद्यपक्वान्नादीनां च विंशतिभागः पञ्चविंशतिभागो वा ॥ कZ_०२.२२.०७ ॥
कपड़ा, चौपाए, दोपाए, सूत, कपास, सुगंध-द्रव्य, औषधि, लकड़ी, बाँस, छाल-रेशा, चमड़ा और मिट्टी के बर्तन; तथा धान्य, तेल/चर्बी, क्षार, नमक, मद्य, पका हुआ भोजन आदि—इन पर शुल्क बीसवाँ भाग या पच्चीसवाँ भाग है।
Sutra 8
द्वारादेयं शुल्कं पञ्चभागः आनुग्राहिकं वा यथादेशोपकारं स्थापय्तेत् ॥ कZ_०२.२२.०८ ॥
द्वार-शुल्क पाँचवाँ भाग है; या वह देश/प्रदेश को हुए उपकार के अनुपात में रियायती (आनुग्राहिक) शुल्क निर्धारित करे।
Sutra 9
जातिभूमिषु च पण्यानां विक्रयः ॥ कZ_०२.२२.०९ ॥
वस्तुओं का विक्रय उनके निर्धारित जाति-भूमि (श्रेणी-स्थल/उत्पादन-क्षेत्र) में भी किया जाए।
Sutra 10
खनिभ्यो धातुपण्यादाने षट्छतमत्ययः ॥ कZ_०२.२२.१० ॥
खानों से धातु-व्यापार का माल लेने पर दंड (अत्यय) छह सौ पण है।
Sutra 11
पुष्पफलवाटेभ्यः पुष्पफलादाने चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ॥ कZ_०२.२२.११ ॥
फूल-फल के बागों से फूल या फल लेने पर चौवन पण का दण्ड है।
Sutra 12
षण्डेभ्यः शाकमूलकन्दादाने पादोनं द्विपञ्चाशत्पणो दण्डः ॥ कZ_०२.२२.१२ ॥
उपवन/रोपणों से साग, जड़ या कन्द लेने पर द्विपञ्चाशत् पण का चौथाई कम (अर्थात् 39 पण) दण्ड है।
Sutra 13
क्षेत्रेभ्यः सर्वसस्यादाने त्रिपञ्चाशत्पणः ॥ कZ_०२.२२.१३ ॥
खेतों से किसी भी प्रकार की फसल लेने पर तिरेपन पण का दण्ड है।
Sutra 14
पणोऽध्यर्धपणश्च सीतात्ययः ॥ कZ_०२.२२.१४ ॥
सीता-अत्यय (कृषि-भूमि/राजस्व) सम्बन्धी दण्ड एक पण और डेढ़ पण (निर्धारित राशि के रूप में) है।
Sutra 15
पण्यानां स्थापयेच् शुक्लमत्ययं चापकारतः ॥ कZ_०२.२२.१५च्द् ॥
वह माल/वस्तुओं के लिए दण्ड-तालिका निश्चित करे और ‘शुक्ल’ दण्ड भी किए गए अपकार/दुरुपयोग के अनुपात में निर्धारित करे।
Cleaner, safer markets with reduced adulteration and consumer harm; higher trust in state-supervised trade, fewer disputes, and steadier commercial flows that support prosperity and fiscal stability.
This sutra itself does not specify the fine; in the chapter’s regulatory logic, non-compliance (adulteration/harmful goods) is met with graded fines, confiscation, and punitive enforcement by the Paṇyādhyakṣa according to the severity of apakāra and the intent to defraud.