
Ekādaśī-vrata (Observance of Ekādaśī)
दशमी-व्रत के तुरंत बाद अग्निदेव एकादशी-व्रत का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि यह उपवास भुक्ति और मुक्ति देने वाली साधना है। व्रत की तैयारी दशमी से होती है—नियत आहार, मांस-त्याग और ब्रह्मचर्य से शरीर-मन शुद्ध किए जाते हैं। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की एकादशी में भोजन निषिद्ध है; विशेषकर जब एकादशी द्वादशी से मिलती है तब हरि-सन्निधि बढ़ती मानी जाती है और पारण का समय निर्णायक होता है। कुछ तिथि-भाग की शर्तों में पारण त्रयोदशी को भी किया जा सकता है, जिसका पुण्य सौ वैदिक यज्ञों के समान कहा गया है; पर दशमी-मिश्रित एकादशी का व्रत नहीं करना चाहिए, वह विपरीत फल देता है। कमलनयन अच्युत की शरण लेकर भक्तिपूर्वक संकल्प किया जाता है। शुक्ल एकादशी में पुष्य नक्षत्र तथा श्रवण-युक्त एकादशी/द्वादशी (विजया तिथि) को शुभ बताया गया है; फाल्गुन-पुष्य-विजया में मधु और मांस से परहेज़ करने पर करोड़-गुणा पुण्य कहा गया है। अंत में विष्णु-पूजा सर्वोपकाररूप है, जो समृद्धि, संतान और विष्णुलोक में मान प्रदान करती है।
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One should eat in a regulated manner and abstain from meat and sexual intercourse, establishing bodily restraint as the precondition for a valid Ekādaśī fast.
By combining ethical restraint, precise calendrical discipline (tithi/nakṣatra rules), and Viṣṇu-bhakti through pūjā and śaraṇāgati, the vrata is taught as karma-purification that yields prosperity and social stability while directing the devotee toward liberation and Viṣṇu-loka.