Adhyaya 339
Sahitya-shastraAdhyaya 33910 Verses

Adhyaya 339

Rīti-nirūpaṇam (Explanation of Poetic Style)

अलंकार-शास्त्र की परंपरा में भगवान अग्नि रस-विचार से आगे बढ़कर ‘रीति’ का निरूपण करते हैं और शैली को वाक्-विद्या का औपचारिक अंग बताते हैं। वे रीति के चार भेद—पाञ्चाली, गौड़ी (गौड़देशीय), वैदर्भी और लाटी—का वर्णन करते हैं, जिनकी पहचान अलंकरण-घनत्व (उपचार), वाक्य-संयोजन (संदर्भ) और विस्तार/विग्रह से होती है। इसके बाद काव्य-रीति से नाट्य-वृत्ति की ओर आते हुए चार वृत्तियाँ—भारती, आरभटी, कौशिकी और सात्त्वती—बताई जाती हैं, जिससे काव्य-तत्त्व और नाट्य-धर्म का समन्वय होता है। भारती को वाणी-प्रधान, स्वाभाविक भाषण वाली और भरत-परंपरा से संबद्ध कहा गया है; इसके अंगों तथा सहायक नाट्य-रूपों (जैसे वीथी, प्रहसन) और वीथी-अंगों की सूचियाँ भी दी गई हैं। अंत में प्रहसन को हास्य-प्रहसन (फार्स) और आरभटी को जादू, युद्ध आदि उर्जस्वी दृश्यों तथा तीव्र रंग-क्रिया वाली वृत्ति बताकर दिखाया गया है कि धर्म-संस्कृति में सौंदर्य-तकनीक अनुशासित अभिव्यक्ति की सेवा करती है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे अलङ्कारे शृङ्गारादिरसनिरूपणं नामाष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः मुहुरिति ख अथोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः रीतिनिरूपणं अग्निरुचाच वाग्विद्यासम्प्रतिज्ञाने रीतिः सापि चतुर्विधा पाञ्चाली गौडदेशीया वैदर्भी लाटजा तथा

इस प्रकार अग्नि-महापुराण के अलंकार-प्रकरण में ‘शृंगारादि रस-निरूपण’ नामक 338वाँ अध्याय समाप्त हुआ। तत्पश्चात 339वाँ अध्याय ‘रीति-निरूपण’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—वाक्-विद्या के प्रतिज्ञान में रीति चार प्रकार की है—पाञ्चाली, गौडदेशीया (गौड़ी), वैदर्भी और लाटजा।

Verse 2

उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली ह्रस्वविग्रहा अनवस्थितसन्दर्भा गौडीया दीर्घविग्रहा

पाञ्चाली रीति उपचरों (अलंकारयुक्त प्रयोगों) से युक्त, मृदु तथा संक्षिप्त संरचना वाली होती है। गौडीया रीति में संदर्भ-क्रम स्थिर नहीं रहता और उसकी संरचना विस्तृत होती है।

Verse 3

उपचारैर् न बहुभिरुपचारैर् विवर्जिता नातिकोमलसन्दर्भा वैदर्भी मुक्तविग्रहा

वैदर्भी रीति न तो अत्यधिक अलंकारों से बोझिल होती है, न ही अलंकार-रहित; उसका संदर्भ अत्यन्त कोमल नहीं होता और वह दोषपूर्ण/विच्छिन्न रचना से मुक्त रहती है।

Verse 4

लाटीया स्फुटसन्धर्भा नातिविस्फुरविग्रहा परित्यक्तापि भूयोभिरुपचारैर् उदाहृता

लाटीया रीति की रचना स्पष्ट और सुगठित होती है; उसकी पदावली अत्यधिक चमत्कारपूर्ण नहीं होती। यद्यपि कुछ लोग उसे छोड़ भी दें, फिर भी अनेक आचार्य उसे बहुत-से प्रचलित उपाचारों (परंपरागत प्रयोगों) द्वारा वर्णित करते हैं।

Verse 5

क्रियास्वविषमा वृत्तिर्भारत्यारभटी तथा कौशिकी सात्वती चेति सा चतुर्धा प्रतिष्ठिता

क्रियाओं में विविधता रखने वाली नाट्य-वृत्ति चार प्रकारों में प्रतिष्ठित है—भारती, आरभटी, कौशिकी और सात्वती।

Verse 6

वाक्प्रधाना नरप्राया स्त्रीयुक्ता प्राकृतोक्तिता भरतेन प्रणीतत्वाद् भारती रीतिरुच्यते

जो रीति वाक्-प्रधान है, प्रायः पुरुष-पात्रों से संबद्ध है, स्त्री-पात्रों को भी स्थान देती है, और प्राकृत/स्वाभाविक बोली में कथन करती है—भरत द्वारा प्रणीत होने से वही ‘भारती’ रीति कहलाती है।

Verse 7

चत्वार्यङ्गानि भारत्या वीथी प्रहसनन्तथा प्रस्तावना नाटकादेर्वीथ्यङ्गाश् च त्रयोदश

भारती के चार अंग हैं; इसी प्रकार वीथी और प्रहसन (के अंग) भी बताए गए हैं। नाटक आदि रूपकों में प्रस्तावना (प्रोलॉग) होती है; और वीथी के तेरह अंग माने गए हैं।

Verse 8

उद्घातकं तथैव स्याल्लपितं स्याद्द्वितीयकम् असत्प्रलापो वाक्श्रेणी नालिका विपणन्तथा

पहला ‘उद्घातक’ कहलाता है; दूसरा ‘लपित’ कहा गया है। इसी प्रकार ‘असत्प्रलाप’ (असंगत प्रलाप), ‘वाक्श्रेणी’ (वाणी की क्रमबद्ध शृंखला), ‘नालिका’ (संक्षिप्त/शीघ्र वार्ता) और ‘विपणन’ (बाज़ार-सा मोल-भाव) भी (नामित) हैं।

Verse 9

व्याहारस्तिमतञ्चैव छलावस्कन्दिते तथा वाग्वेणीति क , ञ , ट च व्याहारस्त्रिगतञ्चैवेति ख गण्डो ऽथ मृदवश् चैव त्रयोदशमथाचितम्

‘व्याहार’ को ‘तिमत’ भी कहा जाता है; तथा ‘छल’ और ‘अवस्कन्दित’ भी (उसी के भेद) हैं। क, ञ और ट वर्ग के लिए इसे ‘वाग्वेणी’ कहा गया है; ख वर्ग के लिए ‘व्याहार-त्रिगत’। फिर ‘गण्ड’ और ‘मृदव’—इस प्रकार तेरहवाँ पद-समूह कहा गया है।

Verse 10

तापसादेः प्रहसनं परिहासपरं वचः मायेन्द्रजालयुद्धादिबहुलारभटी स्मृता मङ्क्षिप्तकारपातौ च वस्तूत्थापनमेव च

‘प्रहसन’ वह हास्य-नाट्य है जिसमें तापस आदि पात्रों का विनोदपूर्ण अभिनय होता है और वाणी परिहास-प्रधान होती है। ‘आरभटी’ नामक उग्र नाट्य-रीति माया, इन्द्रजाल, युद्ध आदि दृश्यों से भरपूर कही गई है; इसमें शीघ्र हस्त-प्रयोग तथा मंच-सामग्री का उठाना-धारण करना भी सम्मिलित है।

Frequently Asked Questions

The chapter differentiates four rītis by measurable stylistic traits—ornament density (upacāra), coherence of linkage (sandarbha), and compact vs expansive phrasing (vighraha)—and then maps dramatic performance into four vṛttis (Bhāratī, Ārabhaṭī, Kauśikī, Sāttvatī).

By disciplining speech and representation—how emotion, action, and ornament are expressed—rīti and vṛtti cultivate sāttvika clarity, ethical communication, and refined attention, supporting dharma in society while aligning artistry with inner purification.