
Chapter 245 — रत्नपरीक्षा (Examination of Gems)
इस अध्याय में भगवान् अग्नि राजाओं के लिए रत्नपरीक्षा का पाठ बताते हैं, जहाँ आभूषण राजसत्ता का चिह्न और नियंत्रित भोग-वस्तु है। हीरा, पन्ना, माणिक, मोती, नीलम, वैडूर्य (कैट्स-आई), चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक तथा अनेक नामित पत्थर और जैव/खनिज द्रव्य गिनाए गए हैं, ताकि दरबार में पहचान, मूल्यांकन और संग्रह/क्रय हो सके। रत्नों की कसौटी—अन्तःप्रभा, स्वच्छता, निर्मलता और सुगठित आकार, विशेषकर स्वर्ण में जड़े रत्नों के लिए। हीरे के दोषयुक्त रूप (निष्प्रभ, अशुद्ध, फटा, किरकिरा या केवल ‘मरम्मत-योग्य’) पहनने का कठोर निषेध है; उत्तम हीरा षट्कोण, इन्द्रधनुष-सा, सूर्य-दीप्त, शुद्ध और ‘अभेद्य’ कहा गया है; पन्ने-जैसी छींट और तोते के पंख-सी चमक मानक बताई गई। मोतियों की उत्पत्ति-आधारित श्रेणियाँ (सीप, शंख, दाँत, मछली, मेघ) दी गईं; गोलाई, चमक, निर्मलता और आकार उनके गुण हैं, जो सौंदर्य, शकुन-विद्या और राजवैधता से जुड़े हैं।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे आयुधलक्षणादिर्नाम चतुश् चत्वारिंशदधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथ पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमो ऽध्यायः रत्नपरीक्षा अग्निर् उवाच रत्नानां लक्षणं वक्ष्ये रत्नं धार्यमिदं नृपैः वज्रं मरकतं रत्नं पद्मरागञ्च मौक्तिकं
इस प्रकार अग्नि-महापुराण में “आयुध-लक्षण आदि” नामक 244वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 245वाँ अध्याय “रत्न-परीक्षा” आरम्भ होता है। अग्नि बोले—मैं रत्नों के लक्षण कहूँगा; राजाओं को धारण करने योग्य रत्न हैं—वज्र (हीरा), मरकत (पन्ना), पद्मराग (माणिक) और मौक्तिक (मोती)।
Verse 2
इन्द्रनीलं महानीलं वैदूर्यं गन्धशस्यकं चन्द्रकान्तं सूर्यकान्तं स्फटिकं पुलकं तथा
इन्द्रनील, महानील, वैदूर्य, गन्धशस्यक; चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक और पुलक—ये भी (रत्नों में) गिने जाते हैं।
Verse 3
कर्केतनं पुष्परागं तथा ज्योतीरसं द्विज स्पटिकं राजपट्टञ्च तथा राजमयं शुभं
हे द्विज! कर्केतन, पुष्पराग और ज्योतीरसं; तथा स्फटिक, राजपट्ट और शुभ राजमय—ये भी (रत्न/पदार्थ) हैं।
Verse 4
सौगन्धिकं तथा गञ्जं शङ्खब्रह्ममयं तथा गोमेदं रुधिराक्षञ्च तथा भल्लातकं द्विज
हे द्विज! सौगन्धिक, गञ्ज; तथा शङ्ख-सम्बन्धी और ब्रह्ममय पदार्थ; गोमेद, रुधिराक्ष और भल्लातक—इनका भी विचार करना चाहिए।
Verse 5
धूलीं मरकतञ्चैव तुथकं सीसमेव च पीलुं प्रवालकञ्चैव गिरिवज्रं द्विजोत्तम
हे द्विजोत्तम! धूली (सूक्ष्म चूर्ण), मरकत, तुथक (नीला थोथा/विट्रिऑल), सीसा, पीलु, प्रवाल और गिरिवज्र—इनका भी (परिगणन) करना चाहिए।
Verse 6
भुजङ्गममणिञ्चैव तथा वज्रमणिं शुभं टिट्टिभञ्च तथा पिण्डं भ्रामरञ्च तथोत्पलं
सर्प-मणि तथा शुभ वज्र-मणि; और आगे टिट्टिभ, पिण्ड, भ्रामर तथा उत्पल—ये भी (रत्न/ताबीज) नाम से कहे गए हैं।
Verse 7
सुवर्णप्रतिबद्धानि रत्नानि श्रीजयादिके अन्तःप्रभत्वं वैमल्यं सुसंस्थानत्वमेव च
सोने में जड़े हुए—श्री, जय आदि प्रकार के—रत्नों में अंतःप्रभा, निर्मलता (दोषरहितता) और सुगठित आकार अवश्य होना चाहिए।
Verse 8
सुधार्या नैव धार्यास्तु निष्प्रभा मलिनास् तथा खण्डाः सशर्करा ये च प्रशस्तं वज्रधरणम्
जो हीरे केवल सुधार-योग्य हों उन्हें न पहनें; वैसे ही जो निस्तेज, मलिन, टूटे-फूटे या कण-कण (रेतीले दानों) वाले हों। प्रशस्त, निर्दोष हीरे का ही धारण अनुमत है।
Verse 9
अम्भस्तरति यद्वज्रमभेद्यं विमलं च यत् षट्कोणं शक्रचापाभं लघु चार्कनिभं शुभम्
जो ‘जल को पार कराता’ है, जो अभेद्य और निर्मल है—जो षट्कोणीय, इन्द्रधनुष के समान, हल्का, सूर्य-तुल्य तेजस्वी और शुभ है—वही वज्र कहलाता है।
Verse 10
शुकपक्षनिभः स्निग्धः कान्तिमान्विमलस् तथा स्वर्णचूर्णनिभैः सूक्ष्मैर् मरकतश् च विन्दुभिः
वह तोते के पंख के समान, चिकना, कान्तिमान और निर्मल हो; तथा उसमें स्वर्ण-चूर्ण के समान सूक्ष्म कण और मरकत (पन्ना) के समान बिंदु भी हों।
Verse 11
स्फटिकजाः पद्मरागाः स्यू रागवन्तो ऽतिनिर्मलाः जातवङ्गा भवन्तीह कुरुविन्दसमुद्भवाः
स्फटिक से उत्पन्न पद्मराग मणियाँ अत्यन्त निर्मल और गाढ़े रंग वाली होती हैं; और यहाँ कुरुविन्द से उत्पन्न पद्मराग ‘जातवङ्ग’ कहलाते हैं।
Verse 12
सौगन्धिकोत्था काषाया मुक्ताफलास्तु शुक्तिजाः विमलास्तेभ्य उत्कृष्टा ये च शङ्खोद्भवा मुने
सौगन्धिक स्रोत से उत्पन्न मोती कषाय (भूरे) वर्ण के होते हैं; मोती शुक्ति (सीप) से भी उत्पन्न होते हैं। उनमें जो निर्मल हों वे श्रेष्ठ हैं, और हे मुने, शंख से उत्पन्न कहे जाने वाले मोती सर्वोत्कृष्ट माने जाते हैं।
Verse 13
नागदन्तभवाश्चाग्र्याः कुम्भशूकरमत्स्यजाः वेणुनागभवाः श्रेष्ठा मौक्तिकं मेघजं वरं
हाथी के दाँत से उत्पन्न मोती अग्र्य माने जाते हैं; कुम्भ-मछली, शूकर और मत्स्य से उत्पन्न मोती भी ज्ञात हैं। वेणुनाग से उत्पन्न मोती श्रेष्ठ हैं; और मेघ से जन्मा मोती उत्तम कहा गया है।
Verse 14
वृत्तत्वं शुक्रता स्वाच्छ्यंमहत्त्वं मौक्तिके गुणाः इन्द्रनीलं शुभं क्षीरे राजते भ्राजते ऽधिकं
गोलाई, कांति, स्वच्छता और बड़प्पन—ये मोती के गुण हैं। शुभ इन्द्रनील (नीलम) दूध में रखने पर और भी अधिक चमकता-दमकता है।
Verse 15
रञ्जयेत् स्वप्रभावेण तममूल्यं विनिर्दिशेत् नीलरक्तन्तु वैदूर्यं श्रेष्ठं हारादिकं भजेत्
रत्न अपने स्वाभाविक प्रभाव से जैसा रंग-दीप्ति धारण करे, उसी के अनुसार उसका मूल्य निर्धारित करना चाहिए। वैदूर्य (लहसुनिया) में नीले और रक्ताभ वर्ण वाले श्रेष्ठ माने जाते हैं, और हार आदि आभूषणों में उनका प्रयोग करना चाहिए।
A structured rubric for gem quality: radiance (antaḥprabhā), clarity (vaimalya), proper form (susaṃsthāna), explicit diamond disqualifiers (fractures/grit/dullness), and pearl virtues (roundness, luster, clarity, size) plus origin-based grading.
It disciplines royal consumption: gems are not mere luxury but regulated symbols of authority, to be chosen by purity and auspicious qualities, aligning wealth-management with Dharma and social order.