
Chapter 243 — Strī-lakṣaṇa (Characteristics of a Woman)
पूर्व अध्याय में पुरुष-लक्षण का उपसंहार करके यह अध्याय समुद्र के वचन से स्त्री-लक्षण का नीतिशास्त्रीय व लक्षणशास्त्रीय निरूपण करता है, जिससे भावी स्त्री की शुभता परखी जाए। इसमें सुडौल अंग, मित व ललित चाल, सुस्थित पाँव व स्तन, तथा दक्षिणावर्त नाभि जैसे शुभ चिह्न बताए गए हैं। साथ ही स्थूलता, असमानता, कलहशीलता, लोभ, कटुवाणी और कुछ नाम-संबंधी संकेत जैसे अशुभ लक्षण त्याज्य कहे गए हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द को धर्म का मानदंड माना गया है। अध्याय बाह्य सौंदर्य से ऊपर सदाचार व गुण को रखता है—उत्तम आचरण होने पर बाह्य लक्षणों के बिना भी स्त्री ‘शुभ’ मानी जाती है। अंत में हाथ के एक विशेष चिह्न को अपमृत्यु-निवारक व दीर्घायु-सूचक बताकर राजधर्म-व्यवस्था में देह-लक्षणों की मान्यता जोड़ी गई है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे पुरुषलक्षणं नाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथ त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमो ऽध्यायः स्त्रीलक्षणं समुद्र उवाच शस्ता स्त्री चारुसर्वाङ्गी मत्तमातङ्गगामिनी गुरूरुजघना या च मत्तपारावतेक्षणा
इस प्रकार अग्नि महापुराण में ‘पुरुष-लक्षण’ नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब ‘स्त्री-लक्षण’ नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय आरम्भ होता है। समुद्र ने कहा—प्रशंसनीय स्त्री वह है जिसके अंग सर्वथा सुन्दर हों, जिसकी चाल मदमत्त हथिनी जैसी हो, जिसकी जंघाएँ और नितम्ब भारी-भरे हों, और जिसकी आँखें मदमत्त कपोत के समान हों।
Verse 2
सुनीलकेशी तन्वङ्गी विलोमाङ्गी मनोहरा शुभा स्त्री इति ज समभूमिस्पृशौ पादौ संहतौ च तथा स्तनौ
जिस स्त्री के केश सुनील-श्याम और चमकीले हों, शरीर सुकुमार व सुघटित हो, रूप मनोहर हो—वह शुभा कहलाती है; तथा जिसके पाँव भूमि को समान रूप से स्पर्श करें और जिसके स्तन दृढ़ व सुस्थित हों।
Verse 3
नाभिः प्रदक्षिणावर्ता गुह्यमश्वत्थपत्रवत् गुल्फौ निगूढौ मध्येन नाभिरङ्गुष्ठमानिका
नाभि दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) हो; गुप्तांग अश्वत्थ-पत्र के समान आकार वाला हो; गुल्फ (टखने) उभरे हुए न हों, भीतर छिपे हों; और नाभि के मध्य का माप अंगूठे के बराबर हो।
Verse 4
जठरन्न प्रलम्बञ्च रोमरूक्षा न शोभना नर्क्षवृक्षनदीनाम्नी न सदा कलहप्रिया
स्त्री का उदर लटकता या अत्यधिक निकला हुआ न हो; उसके अंग शिथिल न हों; उसके रोम खुरदरे न हों और वह अरूपिणी न हो। उसका नाम भालू, वृक्ष या नदी से सम्बद्ध न हो, और वह सदा कलहप्रिय भी न हो।
Verse 5
न लोलुपा न दुर्भाषा शुभा देवादिपूजिता गण्डैर् मधूकपुष्पाभैर् न शिराला न लोमशा
वह न लोभी है, न कटुभाषिणी; वह शुभ है और देवताओं आदि द्वारा पूजित है। उसके गाल मधूक के पुष्पों के समान हैं; वह न शिराओं से उभरी हुई है, न अत्यधिक रोएँदार।
Verse 6
न संहतभ्रूकुटिला पतिप्राणा पतिप्रिया अलक्षणापि लक्षण्या यत्राकारास्ततो गुणाः
वह भौंहें सिकोड़कर टेढ़ी न रखे; पति को ही प्राण माने और पति को प्रिय हो। बाह्य सौन्दर्य-लक्षण न भी हों, तो भी वह ‘शुभ-लक्षणा’ है; क्योंकि जहाँ उत्तम आचार और आचरण-रूप होता है, वहीं से गुण उत्पन्न होते हैं।
Verse 7
भुवङ्कनिष्ठिका यस्या न स्पृशेन्मृत्युरेव सा
जिस स्त्री की कनिष्ठिका में ‘भुवङ्क’ का चिह्न हो, उसे मृत्यु भी स्पर्श नहीं करती।
It outlines auspicious and inauspicious characteristics—both physical and behavioral—used within lakṣaṇa-śāstra and nīti-śāstra to evaluate suitability and harmony in social life, while emphasizing that virtuous conduct can outweigh mere external features.
The chapter discourages quarrelsomeness, greed, and harsh or foul speech, presenting social temperament as a dharmic indicator of auspiciousness.
It states that even if outward marks are lacking, one may still be considered auspicious when noble demeanor and conduct are present—because virtues arise from character and behavior.