Adhyaya 361
KoshaAdhyaya 36140 Verses

Adhyaya 361

Adhyāya 361 — अव्ययवर्गः (Avyaya-vargaḥ) — The Section on Indeclinables (Colophon/Closure)

इस अध्याय में अग्नि पुराण के कोश-भाग में अव्ययवर्ग का समापन बताया गया है। आग्नेय शिक्षाप्रवाह में अव्ययों जैसे व्याकरण-नियत पदों से आगे बढ़कर वाक्य-प्रयोग में अर्थ-व्यवस्था का संकेत मिलता है। समापन-वाक्य इस तकनीकी इकाई की पूर्णता बताकर अगली विद्या—नानार्थ (बहुअर्थी) शब्दों के वर्गीकरण—की ओर संक्रमण कराता है। ग्रंथ शब्द-ज्ञान को प्रकट उपदेश मानकर बताता है कि शुद्ध भाषिक स्पष्टता यज्ञकर्म, व्यवहार/न्याय, और शास्त्र-व्याख्या में अनिवार्य है; इससे भुक्ति धर्मानुकूल रहती है और मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे अव्ययवर्गा नाम षष्ट्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथैकषष्ट्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः नानार्थवर्गाः अग्निर् उवाच आकाशे त्रिदिवे नाको लोकस्तु भवने जने पद्ये यशसि च श्लोकःशरे खड्गे च सायकः

इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘अव्ययवर्ग’ नामक 361वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब ‘नानार्थवर्ग’ नामक 362वाँ अध्याय आरम्भ होता है। अग्नि बोले—‘नाक’ शब्द आकाश, त्रिदिव (तीसरा स्वर्ग) और स्वर्ग के अर्थ में है। ‘लोक’ शब्द भवन/निवास, जनसमूह, पद्य का पाद, तथा यश के अर्थ में है। ‘सायक’ शब्द बाण और खड्ग—दोनों के लिए प्रयुक्त होता है।

Verse 2

आनकः पटहो भेरी कलङ्को ऽङ्कापवादयोः मारुते वेधसि व्रध्ने पुंसि कः कं शिरो ऽम्बुनोः

‘आनक’ का अर्थ नगाड़ा (पटह-विशेष) है; ‘पटह’ और ‘भेरी’ भी ढोल-वाद्य हैं। ‘कलंक’ शब्द दाग/दूषण तथा अपवाद/निंदा—दोनों अर्थों में है। ‘क’ शब्द वायु, वेधस् (स्रष्टा), व्रध्न और पुरुष के लिए आता है; ‘कम्’ शब्द सिर तथा जल—दोनों के लिए प्रयुक्त होता है।

Verse 3

स्यात् पुलाकस्तुच्छधान्ये संक्षेपे भक्तसिक्थके महेन्द्रगुग्गुलूलूकव्यालग्राहिषु कौशिकः

‘पुलाक’ शब्द तुच्छ/निकृष्ट धान्य के लिए है। ‘संक्षेप’ का अर्थ संक्षिप्त संग्रह/सार है। ‘भक्तसिक्थक’ पके हुए भात की ऊपर जमने वाली स्टार्चयुक्त परत/अवशेष को कहते हैं। ‘कौशिक’ शब्द महेन्द्र, गुग्गुलु, उल्लू, सर्प, तथा पकड़ने/ग्राहक (पकड़ने वाला) के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

Verse 4

शालावृकौ कपिश्वानौ मानं स्यान्मितिसाधनं सर्गः स्वभावनिर्मोक्षनिश् चयाध्यायस्मृष्टिषु

‘शालावृक’ और ‘कपिश्वान’ (एक प्रकार के) सियार के वाचक हैं। ‘मान’ वह है जिससे मापन किया जाता है। ‘सर्ग’ शब्द सृष्टि, स्वभाव, मोक्ष, निश्चय, अध्याय तथा स्मृति-संग्रह/संहिता—इन अर्थों में प्रयुक्त होता है।

Verse 5

योगः सन्नहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु भोगः सुखे स्त्र्यादिभृतावब्जौ शङ्कनिशाकरौ

‘योग’ शब्द सन्नाह/सज्जा (उपकरण बाँधना), उपाय/विधि, ध्यान, संगति/संयोग तथा युक्ति/प्रपञ्च—इन अर्थों में आता है। ‘भोग’ सुख-भोग और स्त्री आदि का भरण-पोषण (निर्वाह) भी है। ‘अब्ज’ (जलज) शंख और चन्द्रमा—दोनों का वाचक है।

Verse 6

काके भगण्डौ करटौ दुश् चर्मा शिपिविष्टकः रिष्टं क्षेमाशुभाभावेष्वरिष्टे तु शुभाशुभे

कौए में विकृत लक्षण होने पर भगण्ड (भगन्दर), करट (फोड़ा/गांठ), दुश्चर्म (दूषित/रोगग्रस्त त्वचा) और शिपिविष्टक—ये ‘अरिष्ट’ माने जाते हैं, अर्थात् अनिष्ट के सूचक अपशकुन। परन्तु क्षेम (कल्याण) और अशुभ-भाव के अभाव में अरिष्ट को मिश्र—शुभ और अशुभ दोनों—समझना चाहिए।

Verse 7

व्युष्टिः फले समृद्धौ च दृष्टिर्ज्ञाने ऽक्ष्णि दर्शने निष्ठानिष्पत्तिनाशान्ताः काष्ठोत्कर्षे स्थितौ दिशि

‘व्यूष्टि’ फल-प्राप्ति और समृद्धि को कहते हैं। ‘दृष्टि’ ज्ञान है; ‘अक्ष्णि/अक्षि’ नेत्र है; और ‘दृष्टि’ दर्शन (देखना) भी है। ‘निष्ठा’, ‘निष्पत्ति’, ‘नाश’ और ‘अन्त’—ये समाप्ति/निवृत्ति के वाचक हैं। ‘काष्ठा’ उत्कर्ष (परम सीमा), स्थिर स्थिति तथा दिशा (दिक्) के अर्थ में भी आती है।

Verse 8

भूगोवाचस्त्विडा इलाः प्रगाढं भृषकृच्छ्रयोः भृशप्रतिज्ञयोर्वाढं शक्तस्थूलौ दृढौ त्रिषु

‘भू’ और ‘गो’ को ‘वाक्’ भी कहा जाता है; तथा ‘इडा’ और ‘इला’ शब्द भी इन्हीं के वाचक हैं। ‘प्रगाढ’ का अर्थ “अत्यन्त कठिन/दुर्गम” है। ‘वाढ’ दृढ़ संकल्प वाले और प्रबल प्रतिज्ञा/व्रत वाले के लिए आता है। तीनों लिंगों में ‘शक्त’ और ‘स्थूल’ का अर्थ “बलवान” और “स्थूल/मोटा” है, और ‘दृढ़’ का अर्थ “अचल/स्थिर” है।

Verse 9

विन्यस्तसंहतौ व्यूढौ कृष्णो व्यासे ऽर्जुने हरौ पणो दूयतादिषूत्सृष्टे भृतौ मूल्ये धने ऽपि च

‘विन्यस्त’ और ‘संहत’ शब्द ‘व्यवस्थित/स्थापित’ अर्थ में हैं; ‘व्यूढ’ का अर्थ ‘पंक्तिबद्ध/व्यूहित’ है। ‘कृष्ण’ नाम व्यास, अर्जुन और हरि (विष्णु) के लिए भी प्रयुक्त होता है। ‘पण’ जुए आदि में दाँव/शर्त है; और वही वेतन (भृति), मूल्य तथा धन का भी वाचक है।

Verse 10

मौर्व्यां द्रव्याश्रिते सत्वशुक्लसन्ध्यादिके गुणः श्रेष्ठे ऽधिपे ग्रामणीः स्यात् जुग्प्साकरुणे घृणे

‘गुण’ शब्द (1) मूर्वा-तंतु की धनुष-डोरी, (2) द्रव्य में आश्रित धर्म/गुण (पदार्थ-आश्रित विशेषता), (3) सत्त्व, (4) श्वेतता, तथा (5) संध्या आदि के अर्थ में आता है। यह ‘श्रेष्ठ’, ‘अधिपति’ और ‘ग्रामणी’ (ग्राम-प्रधान) का भी वाचक है। ‘घृणा’ से जुगुप्सा और करुणा—दोनों अर्थ लिए जाते हैं।

Verse 11

तृष्णा स्पृहापिपासे द्वे विपणिः स्याद्वणिक्पथे विषाभिमरलोहेषु तीक्ष्णं क्लीवे खरे त्रिषु

‘तृष्णा’ और ‘स्पृहा’—ये दोनों शब्द पिपासा/प्यास के लिए प्रयुक्त होते हैं। ‘विपणि’ व्यापारी-पथ या बाजार (वणिकों का मार्ग) को कहते हैं। ‘तीक्ष्ण’ शब्द नपुंसक में विष, लोहा और मारक द्रव्य के अर्थ में; और पुल्लिंग में ‘खर’ अर्थात गधा के अर्थ में आता है।

Verse 12

प्रमाणं हेतुमर्यादाशास्त्रेयत्ताप्रमातृषु करणं क्षेत्रगात्रादावीरिणं शून्यमूषरं

प्रमाण, हेतु और मर्यादा—इनका शास्त्रीय निरूपण प्रामाता (जानने वाले) के संदर्भ से किया जाता है। ‘करण’ शब्द क्षेत्र, शरीर (गात्र) आदि में ‘साधन/उपकरण’ के अर्थ में कहा जाता है। भूमि बाँझ हो तो ‘ईरिण’, खाली हो तो ‘शून्य’, और क्षारी/ऊसर हो तो ‘ऊषर’ कहलाती है।

Verse 13

यन्ता हस्तिपके सूते वह्निज्वाला च हेतयः स्रुतं शास्त्रावधृतयोर्युगपर्याप्तयोः कृतं

‘यन्ता’ शब्द हाथी के चालक (हस्तिपक/महावत) और रथ के सारथि (सूत) के लिए कहा जाता है। ‘हेति’ अर्थात शस्त्र—अग्नि की ज्वालाओं के समान (प्रचंड) माने गए हैं। यह परंपरा से श्रुत रूप में प्राप्त और शास्त्रों द्वारा निश्चित है; युगों तक उचित प्रयोग के लिए पर्याप्त रूप से रचित/स्थापित किया गया है।

Verse 14

ख्याते हृष्टे प्रतीतो ऽभिजातस्तु कुलजे बुधे विविक्तौ पूतविजनौ मूर्छितौ मूड्सोच्छयौ

‘ख्यात’ का अर्थ प्रसिद्ध; ‘हृष्ट’ प्रसन्न; ‘प्रतीत’ स्वीकृत/प्रमाणित। ‘अभिजात’ सुजन्मा; ‘कुलज’ सत्कुल में जन्मा; ‘बुध’ विद्वान। ‘विविक्त’ एकान्तवासी/विरक्त; ‘पूतविजन’ शुद्ध-सज्जनों में गिना जाने वाला। ‘मूर्छित’ अचेत; ‘मूढ-सोच्छय’ मूर्खता का ढेर।

Verse 15

अर्थो ऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु निदानागमयोस्तीर्थमृषिजुष्टजले गुरौ

‘अर्थ’ शब्द ‘अभिधेय’ (जो कहा जाए), ‘वस्तु’ (तत्त्व), ‘प्रयोजन’ (उद्देश्य) और ‘निवृत्ति’ (विरति/समाप्ति) के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है; तथा ‘निदान’ (कारण) और ‘आगम’ (प्रामाणिक शास्त्र) के लिए भी। ‘तीर्थ’, ऋषियों द्वारा सेवित जल, और ‘गुरु’ के लिए भी ‘अर्थ’ कहा जाता है।

Verse 16

प्राधान्ये राजलिङ्गे च वृषाङ्गे ककुदो ऽस्त्रियां स्त्री सम्बिज्ज्ञानसम्भाषाक्रियाकाराजिनामसु

‘ककुद’ शब्द प्राधान्य (श्रेष्ठता), राजलिङ्ग (राजकीय सम्मानसूचक लिङ्ग) और वृष के अंग के अर्थ में स्त्रीलिङ्ग नहीं होता। परन्तु स्त्री के नामों में, तथा ‘सम्बिज्ञान’ (परस्पर/पूर्ण पहचान), ‘सम्भाषा’ (संवाद), ‘क्रिया’ (कर्म) और ‘काराजी’ (कर्ता/एजेंट) के नामों में यह स्त्रीलिङ्ग होता है।

Verse 17

धर्मे रहस्युपनिषत् स्यादृतौ वत्सरे शरत् पदं व्यवसितित्राणस्थानलक्ष्माङ्घ्रिवस्तुषु

धर्म के प्रसंग में ‘उपनिषद्’ शब्द रहस्य (गूढ़ उपदेश) का बोध कराता है। ऋतु और वर्ष के संदर्भ में ‘शरत्’ (शरद्) शब्द प्रयुक्त होता है। ‘पद’ शब्द निर्णय/व्यवस्था, संरक्षण, स्थान/आश्रय, लक्ष्मी (समृद्धि), पाँव, तथा वस्तु—इन अर्थों में आता है।

Verse 18

त्रिष्वष्टमधुरौ स्वादू मृदू चातीक्ष्णकोमलौ सत्ये साधौ विद्यमाने प्रशस्ते ऽभ्यर्हिते च सत्

तीन प्रकार के अर्थों (रस, स्पर्श और गुण/वाणी) में ‘मधुर’ और ‘स्वादु’ शब्द प्रयुक्त होते हैं; इसी प्रकार ‘मृदु’ और ‘कोमल’, तथा ‘अतीक्ष्ण’ (अत्यधिक तीक्ष्ण नहीं) भी। ‘सत्’ शब्द सत्य, साधु/सज्जन, विद्यमान, प्रशस्त, और अभ्यर्हित (सम्मानयोग्य) के अर्थ में आता है।

Verse 19

विधिर्विधाने दैवे ऽपि प्रणिधिः प्रार्थने चरे वधूर्जाया स्नुषा च सुधालेपो ऽमृतं स्नुही

‘विधि’ का अर्थ विधान/नियत कर्मकाण्ड भी है और दैव-आदेश (भाग्य) भी। ‘प्रणिधि’ प्रार्थना में विनयपूर्ण निवेदन है। ‘चरा’ वधू, पत्नी और स्नुषा के लिए आता है। ‘सुधा-लेप’ अमृत है, और ‘स्नुही’ (थोहर) भी ‘अमृत’ कही जाती है।

Verse 20

स्पृहा सम्प्रत्ययः श्रद्धा पण्डितम्मन्यगर्वितौ ब्रह्मबन्धुरधिक्षेपे भानू रष्मिदिवाकरौ

‘स्पृहा’ अभिलाषा/लालसा है; ‘सम्प्रत्यय’ विश्वास/निश्चय है; ‘श्रद्धा’ आस्था है। ‘पण्डित-मन्य’ वह जो अपने को विद्वान माने, और ‘गर्वित’ अभिमानी। ‘ब्रह्मबन्धु’ जन्म से ब्राह्मण परन्तु आचरणहीन—ऐसे के लिए निन्दासूचक शब्द है। ‘भानु’, ‘रश्मि’ और ‘दिवाकर’ सूर्य के नाम हैं।

Verse 21

ग्रावाणौ शैलपाषानौ मूर्खनीचौ पृथग्जनौ तरुशैलौ शिखरिणौ तनुस्त्वग्देहयोरपि

‘ग्रावाण’ और ‘शैल-पाषाण’ पत्थर/शिलाखण्ड के नाम हैं। ‘मूर्ख’ और ‘नीच’ तुच्छ बुद्धि वाले/अधम व्यक्ति के लिए आते हैं। ‘पृथग्जन’ सामान्य जनसमुदाय है। ‘तरु’ और ‘शैल’ ‘शिखरिण’ (शिखरयुक्त पर्वत) के पर्याय हैं। ‘तनु’ शब्द त्वचा और देह—दोनों के लिए भी प्रयुक्त होता है।

Verse 22

आत्मा यत्नो धृतिर्वुद्धिः स्वभावो ब्रह्मवर्ष्म च उत्थानं पौरुषे तन्त्रे व्युत्थानं प्रतिरोधने

आत्मा, यत्न, धृति, बुद्धि, स्वभाव और ब्रह्मवर्ष्म (आध्यात्मिक तेज)—ये सब पौरुष-तन्त्र में ‘उत्थान’ (उद्यम/प्रवृत्ति) कहलाते हैं। प्रतिरोध के प्रसंग में यही ‘व्युत्थान’ (प्रतिउद्यम/सक्रिय प्रतिरोध) कहा जाता है।

Verse 23

निर्यातनं वैरशुद्धौ दाने न्यासार्पणे ऽपि च व्यसनं विपदि भ्रशे दोषे कामजकोपजे

‘निर्यातन’ वैर-शुद्धि/वैर-निवृत्ति के अर्थ में, तथा दान और न्यास-समर्पण (अमानत सौंपने) के प्रसंग में भी प्रयुक्त होता है। ‘व्यसन’ विपत्ति, पतन, तथा कामजन्य क्रोध से उत्पन्न दोष—इन रूपों में आने वाली आपदा/दुःख को कहते हैं।

Verse 24

मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः

शिकार, जुए की लत, दिन में सोना, निंदा, स्त्री-विषयक भोग, मद्यपान, गीत-वाद्य-नृत्य का त्रिक, और व्यर्थ घूमना—ये काम से उत्पन्न दस दुर्गुणों का समूह है।

Verse 25

पैशून्यं साहसं द्रोह ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् वाग्दण्डश् चैव पारुष्यं क्रोधजो ऽपि गणो ऽष्टकः

चुगली, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, दूसरे के प्रयोजन का दूषण/कुत्सित व्याख्या, वाणी से दंड देना, और कठोर वचन—यह क्रोध से उत्पन्न आठ दोषों का समूह है।

Verse 26

अकर्मगुह्ये कौपीनं मैथुनं सङ्गतौ रतौ प्रधानं परमार्था धीः प्रज्ञानं बुद्धिचिह्नयोः

अकर्म के गूढ़ उपदेश (संन्यास-रहस्य) में कौपीन धारण करना विहित है; मैथुन संगति और रति (इन्द्रिय-सुख) के अंतर्गत आता है। परम अर्थ का प्रधान तत्त्व परतत्त्व का बोध है; और प्रज्ञान (विवेक-बुद्धि) जाग्रत बुद्धि का लक्षण है।

Verse 27

क्रन्दने रोदनाह्वाने वर्ष्म देहप्रमाणयोः आराधनं साधने स्यादवाप्तौ तोषणे ऽपि च

‘आराधन’ शब्द क्रंदन—रोना और पुकारना—के अर्थ में प्रयुक्त होता है; ‘वर्ष्म’ देह तथा देह-प्रमाण के लिए कहा जाता है। फिर ‘आराधन’ साधन-सम्पादन, प्राप्ति, और तुष्टि/प्रसन्नता के अर्थ में भी आता है।

Verse 28

रत्नं स्वजातिश्रेष्ठे ऽपि लक्ष्म चिह्नप्रधानयोः कलापो भूषणे वर्हे तूणीरे संहते ऽपि च

‘रत्न’ शब्द अपने जाति में श्रेष्ठ वस्तु के लिए भी आता है; ‘लक्ष्म’ चिह्न तथा प्रधान लक्षण के अर्थ में है। ‘कलाप’ का अर्थ आभूषण, मयूर-पिच्छों का गुच्छ, तूणीर, और संहति/समूह भी है।

Verse 29

तल्पं शय्याट्टारेषु डिम्भौ तु शिशुवालिशौ स्तम्भौ स्थूणाजडीभावौ सभ्ये संसदि वै सभा

“तल्प” का अर्थ शय्या/बिस्तर है; “शय्या” को “अट्टार” भी कहा जाता है। “डिम्भ” बालक है और अपरिपक्व/मूर्ख (शिशु, वालीश) भी। “स्तम्भ” खंभा है, “स्थूणा” भी; तथा जड़ता/स्तब्धता (जड़ीभाव) भी। “सभ्य” सभासद है और “सभा” संसद/परिषद्/राजदरबार है।

Verse 30

किरणप्रग्रहौ रश्मी धर्माः पुण्ययमादयः ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु

“किरण” और “प्रग्रह” दोनों किरणों के नाम हैं; “रश्मि” भी किरण ही है। “धर्म” का अर्थ पुण्य, यम आदि भी होता है। “ललाम” पूँछ, पुंड्र/तिलक, घोड़े की भूषा, प्रधानता तथा ध्वजा/केतु—इन अर्थों में प्रयुक्त होता है।

Verse 31

प्रत्ययो ऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु समयाः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः

“प्रत्यय” शब्द अधीनता, शपथ, ज्ञान और विश्वास के हेतु/आधार के अर्थ में प्रयुक्त होता है। “समय” का अर्थ निश्चित समझौता है—अर्थात् शपथ, आचार-व्यवहार, काल-नियम, सिद्धान्त तथा परस्पर संविद् (अनुबंध)।

Verse 32

अत्ययो ऽतिक्रमे कृच्छ्रे सत्यं शपथतथ्ययोः वीर्यं बलप्रभावौ च रूप्यं रूपे प्रशस्तके

“अत्यय” शब्द अतिक्रमण (सीमा लाँघना) और कृच्छ्र (संकट) के अर्थ में है। “सत्य” शपथ तथा तथ्य—दोनों को सूचित करता है। “वीर्य” बल और प्रभाव/सामर्थ्य है। “रूप्य” चाँदी तथा प्रशस्त (उत्तम) रूप के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

Verse 33

दुरोदरो द्यूतकारे पणे द्यूते दुरोदरं महारण्ये दुर्गपथे कान्तारः पुन्नपुंसकं

“दुरोदर” शब्द जुआरी, दाँव (पण) और जुए—इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। “कान्तार” महान वन तथा दुर्गम पथ के अर्थ में आता है; यह पुल्लिंग और नपुंसकलिंग—दोनों में चलता है।

Verse 34

यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहादिके हरिः दरो ऽस्त्रियां भये श्वभ्रे जठरः कठिने ऽपि च

यम, वायु, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, विष्णु, सिंह आदि प्रसंगों में वह “हरि” कहलाता है। ‘स्त्री नहीं’ अर्थात पुरुष के अर्थ में वह “दर” है; भय और गहरे गड्ढे/खाई में “जठर” कहा जाता है; और ‘कठोर/अडिग’ अर्थ में भी वही नाम प्रयुक्त होता है।

Verse 35

उदारो दातृमहतोरितरस्त्वन्यनीचयोः चूडा किरीटं केशाश् च संयता मौलयस्त्रयः

उदार पुरुष महान दाता के रूप में जाना जाता है; इसके विपरीत स्वभाव नीच और अधम लोगों में देखा जाता है। शिरोवेष के तीन प्रकार हैं—चूड़ा (जटा/शिखा), किरीट (मुकुट), और संयत केश (बंधे/सँवारे हुए बाल)।

Verse 36

बलिः करोपहारादौ सैन्यस्थैर् यादिके बलं स्त्रीकटीवस्त्रबन्धे ऽपि नीवी परिपणे ऽपि च

‘बलि’ शब्द कर/उपहार आदि, अर्थात हाथ से दी गई भेंट के अर्थ में आता है; और ‘बल’ सेना की शक्ति तथा उससे संबद्ध अर्थों में। ‘नीवी’ स्त्री की कटि-वस्त्र-गाँठ (कमरबंध) के लिए, और जुए/शर्त में रखी गई बाज़ी (दाँव) के लिए भी प्रयुक्त होता है।

Verse 37

शुक्रले मूषिके श्रेष्ठे सुकृते वृषभे वृषः द्यूताक्षे सारिफलके ऽप्याकर्षो ऽथाक्षमिन्द्रिये

‘वृषः’ शब्द कामी पुरुष, मूषक, श्रेष्ठ, सुकृत (पुण्यकर्म) और वृषभ—इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। ‘आकर्षः’ जुए की पासे (द्यूताक्ष) तथा सारी-फल के बीज के लिए भी कहा जाता है; और ‘अक्षम्’ इन्द्रिय (ज्ञानेंद्रिय) को सूचित करता है।

Verse 38

ना द्यूताङ्गे च कर्षे च व्यवहारे कलिद्रुमे ऊष्णीषः स्यात् किरीटादौ कर्षूः कुल्याभिधायिनी

द्यूत-शास्त्र में, ‘कर्ष’ नामक मान में, तथा व्यवहार/न्यायिक प्रयोग में ‘कलि’ शब्द प्रयुक्त होता है; और ‘कलि-द्रुम’ (एक वृक्ष) के लिए भी। शिरोभूषणों में ‘ऊष्णीष’ पगड़ी या किरीट आदि को कहते हैं। और ‘कर्षू’ वह शब्द है जो छोटी नहर/कुल्या का बोध कराता है।

Verse 39

प्रत्यक्षे ऽधिकृते ऽध्यक्षः सूर्यवह्नी विभावसू शृङ्गारादौ विषे वीर्ये गुणे रागे द्रवे रसः

प्रत्यक्ष ज्ञान के क्षेत्र में अधिष्ठाता ‘अध्यक्ष’ कहलाता है; सूर्य और अग्नि ‘विभावसु’ भी कहे जाते हैं। शृंगार आदि रसों में इसे ‘रस’ कहते हैं; विष में ‘वीर्य’ (प्रभाव/शक्ति); गुण में ‘गुण’; रंजन/आसक्ति में ‘राग’; और द्रव पदार्थ में ‘द्रव/रस’ कहा जाता है।

Verse 40

तेजःपुरीषयोर्वर्च आगः पापापराधयोः छन्दः पद्ये ऽभिलासे च साधीयान् साधुवाढयोः व्यूहो वृन्दे ऽप्यहिर्वृत्रे ऽप्यग्नीन्द्वर्कास्तमोनुदः

‘वर्चस्’ तेज और मल—दोनों का बोधक है; ‘आगस्’ पाप तथा अपराध—दोनों का। ‘छन्दस्’ छंदोबद्ध पद्य और अभिलाषा—दोनों के लिए आता है। ‘साधीयान्’ श्रेष्ठ तथा साधु-वृद्धि (कल्याण-वर्धक) के अर्थ में है। ‘व्यूह’ समूह/वृंद है; ‘अहि’ वृत्‍र का नाम है। ‘अग्नि-इन्द्र-अर्क’ अंधकार-नाशक कहलाते हैं।

Frequently Asked Questions

Its primary function is structural: it formally closes the Avyaya-varga unit, signaling completion of the indeclinables taxonomy before moving to polysemous terms.

By enforcing linguistic discipline (śabda-śuddhi) it supports correct understanding and application of dharma and mantra-meaning, reducing semantic confusion that can distort practice.