
Vishahṛn Mantrauṣadham (Poison-Removing Mantra and Medicinal Remedy) — Colophon and Transition
यह अध्याय औपचारिक कोलोफ़न के साथ समाप्त होता है, जिसमें विषय को मंत्र और औषधि से संयुक्त विषहर-तंत्र बताया गया है। अग्नि–वसिष्ठ संवाद में यह तकनीकी ज्ञान ‘प्रकाशित’ रूप में प्रमाणित होकर अगले, अधिक विस्तृत चिकित्साध्याय की भूमिका बनता है। यह संक्रमण विश्वकोशीय रचना में एक कड़ी की तरह है—सामान्य प्रतिविष सिद्धांतों से प्राणी-विशेष उपचार-विधानों, विशेषतः सर्पदंश-विषचिकित्सा, की ओर संकेत करता है। फ्रेमिंग बताती है कि आग्नेय विद्या में मंत्र-प्रामाण्य, शुद्ध विधि और औषध-प्रयोग धर्म-निर्देशित स्वास्थ्य-सेवा की एक ही निरंतर धारा हैं।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुरणे विषहृन्मन्त्रौषधं नाम षन्नवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथ सप्तनवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः गोनसादिचिकित्सा अग्निरुचाच गोनसादिचिकित्साञ्च वशिष्ठ शृणु वच्मि ते ह्रीं ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा ताम्बूलखादनान्मन्त्री हरेन्मण्डलिनो विषं
इस प्रकार आग्नेय महापुराण में “विषहर मन्त्र-औषध” नामक २९७वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब २९८वाँ अध्याय—“गोनस आदि की चिकित्सा” आरम्भ होता है। अग्नि बोले—हे वशिष्ठ, सुनो; मैं गोनस आदि सर्पों की चिकित्सा बताता हूँ। ‘ह्रीं ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’—इस मन्त्र का जप करके ताम्बूल खाने से मण्डलिन सर्प का विष दूर होता है।
Verse 2
लशुनं रामठफलं कुष्ठाग्निव्योषकं विषे स्नुहीक्षीरं गव्यघृतं पक्षं पीत्वाहिजे विषे
विष-प्रयोग में लहसुन, रामठ का फल, कुष्ठ, अग्नि (चित्रक) और त्रयोष (सोंठ, मरीच, पिप्पली) देना चाहिए। सर्प-विष में स्नुही का क्षीर गो-घृत के साथ पन्द्रह दिन तक पीने से विष शान्त होता है।
Verse 3
अथ राजिलदष्टे च पेया कृष्णा समैन्धवा आज्यक्षौद्रशकृत्तोयं पुरीतत्या विषापहं
अब राजिला सर्प के दंश में कृष्णा (काली मिर्च) और सैन्धव लवण सहित पतली पेया देनी चाहिए। तथा घी, मधु, गोमय-जल और पुरीतत्या का मिश्रण भी विषहर है।
Verse 4
सकृष्णाखण्डदुग्धाज्यं पातव्यन्तेन माक्षिकं व्योषं पिच्छं विडालास्थि नकुलाङ्गरुहैः समैः
कृष्णाखण्ड (काला शर्करा), दूध और घी के साथ मिलाकर उसके साथ मधु पीना चाहिए। तथा त्रिकटु (सोंठ-मरीच-पिप्पली), पिच्छ (पंखों का रोआँ), बिल्ली की अस्थि और नेवले के शरीर के बाल—इन सबको समान मात्रा में मिलाकर देना चाहिए।
Verse 5
चूर्णितैर् मेषदुग्धाक्तैर् धूपः सर्वविषापहः रोमनिर्गुण्डिकाकोकवर्णैर् वा लशुनं समं
भेड़ के दूध से भिगोए हुए चूर्णित द्रव्यों से बनाया गया धूप सभी प्रकार के विष को नष्ट करता है। अथवा रोमा, निर्गुण्डिका और कोकवर्ण को समान भाग लेकर उतनी ही मात्रा में लहसुन मिलाकर धूप करें।
Verse 6
मुनिपत्रैः कृतस्वेदं दष्टं काञ्चिकपाचितैः मूषिकाः षोडश प्रोक्ता रसङ्कार्पासजम्पिवेत्
मुनि-पत्तों से स्वेदन करके दंश-स्थान का उपचार करें और काञ्चिका (खट्टा मांड/किण्वित द्रव) में पकाई हुई औषधि दें। मूषिका के सोलह भेद कहे गए हैं; तथा कार्पास और जामुन से युक्त रस का पान कराएँ।
Verse 7
सतैलं मूषिकार्तिघ्नं फलिनीकुसुमन्तथा सनागरगुडम्भक्ष्यं तद्विषारोचकापहं
तेल के साथ सेवन करने पर यह मूषिका-जन्य पीड़ा को शांत करता है। इसी प्रकार फलिनी का पुष्प सोंठ और गुड़ के साथ खाने से उस विष के कारण हुई अरुचि (भूख न लगना) दूर होती है।
Verse 8
चिकित्सा विंषतिर्भूता लूताविषहरो गणः पद्मकं पाटली कुष्ठं नतमूशीरचन्दनं
यह बीस प्रकार की चिकित्सा-विधि है। लूता-विष को हरने वाला गण—पद्मक, पाटली, कुष्ठ, नत, उशीर और चन्दन—(इन द्रव्यों से युक्त) है।
Verse 9
निर्गुण्डी शारिवा शेलु लूतार्तं सेचयेज्जलैः गुञ्जानिर्गुण्डिकङ्कोलपर्णं शुण्ठी निशाद्वयं
लूता-दंश से पीड़ित व्यक्ति के अंग को निर्गुण्डी, शारिवा और शेलु से सिद्ध जल से धोएँ/सींचें। तथा गुंजा, निर्गुण्डिका, कंकोल-पत्र, सोंठ और निशा-द्वय (हल्दी व दारुहरिद्रा) से बना योग लगाएँ/सेवन कराएँ।
Verse 10
करञ्जास्थि च तत्पङ्कैः वृश्चिकार्तिहरं शृणु मञ्जिष्ठा चन्दनं व्योषपुष्पं शिरीषकौमुदं
अब वृश्चिक-दंश से उत्पन्न पीड़ा को हरने का उपाय सुनो—करंज की गुठली/अस्थि और उसका लेप; साथ ही मञ्जिष्ठा, चन्दन, व्योष के पुष्प, शिरीष और कौमुद।
Verse 11
संयोज्याश् चतुरो योगा लेपादौ वृश्चिकापहाः ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि छिन्द किरि भिन्द खड्गे न छेदय शूलेन भेदय चक्रेण दारय ॐ ह्रूं फट् मन्त्रेण मन्त्रितो देयो गर्धभादीन्निकृन्तति
चार योग मिलाकर लेप आदि रूप में लगाने से वृश्चिक-विष का नाश होता है। मंत्र—“ॐ नमो भगवते रुद्राय; चिवि, छिन्द, किरि, भिन्द; खड्ग से काट, शूल से भेद, चक्र से चीर—ॐ ह्रूं फट्।” इस मंत्र से अभिमंत्रित औषधि देने पर वृश्चिक आदि से उत्पन्न बाधा कट जाती है।
Verse 12
त्रिफलोशीरमुस्ताम्बुमांसीपद्मकचन्दनं अजाक्षीरेण पानादेर्गर्धभादेर्विषं हरेत्
त्रिफला, उशीर, मुस्ता, अम्बु (शीतल जल-कल्प), मांसी, पद्मक और चन्दन—इनको बकरी के दूध के साथ पान आदि रूप में देने से गधे आदि के दंश/काट से उत्पन्न विष दूर होता है।
Verse 13
हरेत् शिरीषपञ्चाङ्गं व्योषं शतपदीविषं सकन्धरं शिरीषास्थि हरेदुन्दूरजं विषं
शिरीष के पंचांग, व्योष और शतपदी-विषहर औषधि का प्रयोग करें; तथा सकन्धर और शिरीष की अस्थि/बीज भी दें—ये सब चूहे/मूषक से उत्पन्न विष को हरते हैं।
Verse 14
व्योषं ससर्पिः पिण्डीतमूलमस्य विषं हरेत् तत्पक्षैर् इति ज , ञ , ट च चिरि इति ज क्षारव्योषवचाडिङ्गुविडङ्गं सैन्धवन्नतं
व्योष को घी के साथ तथा कुटी हुई मूल के साथ देने से यह विष उतरता है। इस प्रकार के विष में ‘ज, ञ, ट’ का गण-संकेत तथा ‘चिरि’ का निर्देश कहा गया है। क्षार-कल्प में व्योष, वचा, डिंगु/हिंगु, विडंग, सैन्धव (सेंधा नमक) और न्नत नामक औषधि मिलाकर प्रतिविष रूप में दिया जाता है।
Verse 15
अम्बष्ठातिबलाकुष्ठं सर्वकीटविषं हरेत् यष्टिव्योषगुडक्षीरयोगः शूनो विषापहः
अम्बष्ठा, अतिबला और कुष्ठ का संयोग सभी कीटों के विष को हरता है। यष्टिमधु, त्रिकटु, गुड़ और दूध से बना योग सूजन तथा विष का नाशक है।
Verse 16
ॐ सुभद्रायै नमः ॐ सुप्रभायै नमः यान्यौषधानि गृह्यन्ते विधानेन विना जनैः
ॐ सुभद्रा को नमस्कार; ॐ सुप्रभा को नमस्कार। जो औषधियाँ लोग विधि के बिना एकत्र करते हैं—
Verse 17
तेषां वीजन्त्व्या ग्राह्यमिति ब्रह्माब्रवीच्च ताम् ताम्प्रणम्यौषधीम्पश्चात् यवान् प्रक्षिप्य मुष्टिना
ब्रह्मा ने कहा—“उन्हें पंखा झलते हुए (वीजन करते हुए) ग्रहण करना चाहिए।” फिर प्रत्येक औषधि को प्रणाम करके बाद में मुट्ठी भर जौ अर्पित करे।
Verse 18
दश जप्त्वा मन्त्रमिदं नमस्कुर्यात्तदौषधं त्वामुद्धराम्यूर्ध्वनेत्रामनेनैव च भक्षयेत्
इस मंत्र का दस बार जप करके नमस्कार करे। फिर उस औषधि से कहे—“हे ऊर्ध्वनेत्रा औषधि, मैं तुम्हें उखाड़ता/ग्रहण करता हूँ,” और उसी विधि/मंत्र से उसे सेवन करे।
Verse 19
नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्णपराजयं
पुरुषसिंह (नृसिंह) को नमस्कार; गोपाल (गोपाळक) को भी नमस्कार। वह स्वयं ही युद्ध में कृष्ण की पराजय को जान लेता है।
Verse 20
एतेन सत्यवाक्येन अगदो मे ऽस्तु सिध्यतु नमो वैदूर्यमाते तन्न रक्ष मां सर्वविषेभ्यो गौरि गान्धारि चाण्डालि मातङ्गिनि स्वाहा हरिमाये औषधादौ प्रयोक्तव्यो मन्त्रो ऽयं स्थावरे विषे
इस सत्य-वचन के प्रभाव से मेरा अगद (विषनाशक) सिद्ध हो। हे वैदूर्यमाता, आपको नमस्कार; मुझे समस्त विषों से रक्षा करें। हे गौरी, गान्धारी, चाण्डाली, मातङ्गिनी—स्वाहा! हे हरिमाया—यह मंत्र स्थावर (निर्जीव) विष के लिए औषधि आदि में प्रयोग योग्य है।
Verse 21
भुक्तमात्रे स्थिते ज्वाले पद्मं शीताम्बुसेवितं पाययेत्सघृतं क्षौद्रं विषञ्चेत्तदनन्तरं
भोजन/विष-सेवन के तुरंत बाद जब जलन आरम्भ ही हुई हो, तब शीतल जल में संसिक्त/प्रक्रियित कमल को घी और मधु सहित पिलाए; और उसके बाद विष का उपचार विधिपूर्वक करे।
The chapter’s key technical feature is its textual function: it formally identifies the poison-removal system as mantra-plus-medicine (mantrauṣadha) and signals a structured transition to creature-specific toxicology.
By framing healing knowledge as revealed Agneya Vidya, it positions medical action as dharmic service—protecting life to enable right conduct and higher pursuits, aligning bhukti-support with mukti-orientation.