
Chapter 296 — Viṣa-cikitsā: Mantras and Antidotes for Poison, Stings, and Snake-bite
इस आयुर्वेद-प्रधान अध्याय में भगवान अग्नि वसिष्ठ को विष-चिकित्सा की संक्षिप्त विधि बताते हैं, जिसमें मंत्र-प्रयोग के साथ त्वरित उपचार और औषध-योग सम्मिलित हैं। आरम्भ में कृत्रिम/प्रदत्त विष, विविध विष तथा दंश-विष के लिए विष-शमन मंत्र दिए हैं, जिनमें फैलते विष को ‘मेघ-सी अँधियारी’ खींचकर निकालने और मंत्रान्त में धारण/निग्रह करने का भाव है। फिर बीज-मंत्रों, वैष्णव चिह्नों और श्रीकृष्ण-आह्वान से युक्त ‘सर्वार्थ-साधक’ मंत्र आता है। इसके बाद प्रेतगणाधिपति रुद्र को संबोधित ‘पाताल-क्षोभ’ मंत्र डंक, सर्पदंश तथा आकस्मिक स्पर्शजन्य विष में शीघ्र शमन हेतु कहा गया है। आगे दंश-चिह्न का छेदन/दाह, तथा शिरीष, अर्क-क्षीर, तीखे मसालों आदि से बने प्रतिविष योग—पान, लेप, अंजन और नस्य आदि अनेक मार्गों से—वर्णित हैं।
Verse 1
माकृत्रिमविषमुपविषं नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम दम वम मेघान्धकारधाराकर्षनिर्विषयीभव संहर गच्छ आवेशय विषोत्थापनरूपं मन्त्रान्ताद्विषधारणं ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा ॐ ह्रीं खीं सः ठन्द्रौं ह्रीं ठः जपादिना साधितस्तु सर्पान् बध्नाति नित्यशः
कृत्रिम विष और उपविष का नाश करो; नाना प्रकार के विष का, तथा दंशजन्य विष का नाश करो। ‘धम, दम, वम’—मेघ-सी अंधकारधारा (फैलते विष) को खींच लो; निर्विष बनो; संहार करो, हटो, प्रवेश कर के जकड़ो, विष-उत्थापन (उत्सारण) रूप धारण करो। मंत्र के अंत में विष-धारण: ‘ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा; ॐ ह्रीं खीं सः ठन्द्रौं ह्रीं ठः’। जप आदि से सिद्ध होने पर यह मंत्र सर्पों को नित्य वश/बाँधता है।
Verse 2
एकद्वित्रिचतुर्वीजः कृष्णचक्राङ्गपञ्चकः गोपीजनवल्लभाय स्वाहा सर्वार्थसाधकः
एक, दो, तीन और चार अक्षरों वाले बीजों से युक्त, तथा कृष्ण, चक्र और (विष्णु के) पाँच अंग-चिह्नों सहित, ‘गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’ पर समाप्त होने वाला यह मंत्र सर्वार्थसाधक है।
Verse 3
ॐ नमो भगवते रुद्राय प्रेताधिपतये गुत्त्व गर्ज भ्रामय मुञ्च मुह्य कट आविश सुवर्णपतङ्ग रुद्रो ज्ञापयति ठ पातालक्षोभमन्त्रोयं मन्त्रणाद्विषनाशनः दंशकाहिदंशे सद्यो दष्टः काष्ठशिलादिना
ॐ नमो भगवते रुद्राय, प्रेतों के अधिपति को नमस्कार। “बाँधो/पकड़ो, गर्जो, घुमाओ, छोड़ो, मोहित करो, प्रहार करो, प्रवेश करो; हे स्वर्ण-पतंग!”—ऐसा रुद्र आदेश देता है। यह ‘पाताल-क्षोभ’ मंत्र है; इसके जप से विष नष्ट होता है। डंक या सर्पदंश में, अचानक काटे जाने पर, तथा लकड़ी-पत्थर आदि के स्पर्श से हुए दंश में भी, तत्काल विष-शमन हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।
Verse 4
विषशान्त्यै देहाद्दंशं ज्वालकोकनदादिना शिरीषवीजपुष्पार्कक्षीरवीजकटुत्रयं
विष-शांति के लिए शरीर से दंश-चिह्न को तप्त शस्त्र (जैसे ज्वालक/कौटरी-चाकू आदि) से काटकर निकालें; फिर शिरीष के बीज व पुष्प, अर्क का दूध (लैटेक्स), अर्क के बीज तथा कटुत्रय (तीन तीखे द्रव्य) का लेप लगाएँ।
Verse 5
विषं विनाशयेत् पानलेपनेनाञ्जनादिना शिरीषपुश्पस्य रसभावितं मरिचं सितं
विष का नाश पान कराने, लेप लगाने, अंजन (नेत्र-प्रयोग) आदि विधियों से किया जा सकता है। औषधि यह है—शिरीष-पुष्प के रस में भावित किया हुआ श्वेत मरिच (सफेद मिर्च)।
Verse 6
पाननस्याञ्जनाद्यैश् च विषं हन्यान्न संशयः कोषातकीवचाहिङ्गुशिरीशार्कपयोयुतं
पान, नस्य, अंजन आदि उपायों से विष का नाश होता है—इसमें संदेह नहीं। कोषातकी, वचा, हींग, शिरीष तथा अर्क के दूध (लैटेक्स) से युक्त योग का प्रयोग करें।
Verse 7
गुलु इति ञ ज्वालको कलदालिनेति ख कुटुत्रयं समेषाम्भो हरेन्नस्यादिना विषं रामठेक्ष्वाकुसर्वाङ्गचूर्णं नस्याद्विषापहं
‘गुलु’, ‘ज्वालक’ और ‘कलदालिन्’—ये तीनों समान जल के साथ पीसकर नस्य आदि रूप में दें; इससे विष दूर होता है। इसी प्रकार ‘रामठ’ के साथ इक्ष्वाकु (तुम्बी) के समस्त अंगों का चूर्ण नस्य रूप में देने से विष नष्ट होता है।
Verse 8
इन्द्रबलाग्निकन्द्रोणं तुलसी देविका सहा तद्रसाक्तं त्रिकटुकं चूर्णम्भक्ष्ययिषापहं पञ्चाङ्गं कृष्णपञ्चभ्यां शिरीषस्य विषापहं
इन्द्रबला, अग्निकन्द, द्रोण, तुलसी, देविका और सहा—इनका रस मिलाकर, त्रिकटुक का चूर्ण सेवन करने से विष का नाश होता है। इसी प्रकार शिरीष के पंचांग को ‘कृष्णा’ के पाँच द्रव्यों के साथ मिलाने पर भी विष नष्ट होता है।
It focuses on viṣa-cikitsā (Ayurvedic toxicology): mantric neutralization, emergency bite management, and antidotal formulations administered via pāna, lepa, añjana, and nasya.
It presents mantra-prayoga alongside procedural and pharmacological remedies, treating both as dharmic techniques revealed by Agni for preserving life and restoring order.