
Chapter 290 — गजशान्तिः (Gaja-śānti: Elephant-Pacification Rite)
इस अध्याय में अश्व-शान्ति के बाद शालीहोत्र द्वारा गज-शान्ति का विधान बताया गया है—आयुर्वेद-आधारित पशुचिकित्सा तथा राज-रक्षा हेतु, गज-रोगों के शमन और अशुभ-निवारण के लिए। पंचमी के मुहूर्त से आरम्भ कर विष्णु-श्री, प्रमुख देवता, लोकपाल, नियामक शक्तियाँ और नाग-वंशों का आवाहन होता है। कमल-मण्डल में देवताओं, अस्त्रों, दिक्पालों, तत्त्वों का निश्चित विन्यास तथा बाह्य वर्तुल में ऋषि, सूत्रकार, नदियाँ, पर्वत रखे जाते हैं—चिकित्सात्मक उद्देश्य से ब्रह्माण्ड-रचना का समन्वय। चार धाराओं वाले कलश, ध्वज-तोरण, औषधियाँ और घृताहुतियाँ (प्रति देवता सैकड़ों) निर्दिष्ट हैं; विसर्जन व दक्षिणा में विशेषज्ञ पशु-वैद्यों को भुगतान भी। मंत्र-जप के साथ हथिनी पर आरोहण, राज-अभिषेक-क्रम और ‘श्रीगज’ को रक्षात्मक संबोधन द्वारा गज को युद्ध, यात्रा और गृह में राजा का धर्मिक रक्षक माना जाता है। अंत में गज-अधिकारियों व सेवकों का सम्मान और शुभ सार्वजनिक संकेत हेतु डिण्डिम-नाद का विधान है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे अश्वशान्तिर्नामोननवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथ नवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः गजशान्तिः शालिहोत्र उवाच गजशान्तिं प्रवक्ष्यामि गजरोगविमर्दनीम् विष्णुं श्रियञ्च पञ्चम्यां नागम् ऐरावतं यजेत्
इस प्रकार अग्नि महापुराण में ‘अश्व-शान्ति’ नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब ‘गज-शान्ति’ नामक वही अध्याय आरम्भ होता है। शालिहोत्र बोले—मैं गजों के रोगों का नाश करने वाली गज-शान्ति विधि बताता हूँ। पञ्चमी तिथि को विष्णु, श्री (लक्ष्मी) तथा नाग ऐरावत की पूजा करे।
Verse 2
ब्रह्माणं शङ्करं विष्णुं शक्रं वैश्नवणंयमं चन्द्रार्कौ वरुणं वायुमग्निं पृथ्वीं तथा च खं
ब्रह्मा, शंकर (शिव), विष्णु, शक्र (इन्द्र), वैश्रवण (कुबेर), यम, चन्द्र और सूर्य, वरुण, वायु, अग्नि, पृथ्वी तथा आकाश—इनका स्मरण/आह्वान करे।
Verse 3
शेषं शैलान् कुञ्जरांश् च ये ते ऽष्टौ देवयोनयः विरुपाक्षं महापद्मं भद्रं सुमनसन्तथा
शेष, शैल और कुञ्जर—ये (तथा) आठ देवयोनि (दिव्य-उत्पत्ति वाले) नाग हैं: विरूपाक्ष, महापद्म, भद्र और सुमनस भी।
Verse 4
कुमुदैरावणः पद्मः पुष्पदन्तो ऽथ वामनः सुप्रतीकोञ्जनो नागा अष्टौ होमो ऽथ दक्षिणां
कुमुद, ऐरावण, पद्म, पुष्पदन्त और वामन; तथा सुप्रतीक, अञ्जन और नाग—ये आठ (नाम) हैं। इसके बाद होम और दक्षिणा (विधि-दान) का विधान है।
Verse 5
गजाः शान्त्युदकासिक्ता वृद्धौ नैमित्तिकं सृणु गजानाम्मकरादौ च ऐशान्यां नगराद्वहिः
शान्ति-जल से सिंचित किए जाने पर गजों की वृद्धि/स्वास्थ्य में सुधार होता है। अब निमित्त (शकुन) और उनके फल सुनो: गजों के लिए मकरादि के समय तथा ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में नगर के बाहर होना (अशुभ) माना गया है।
Verse 6
स्थण्डिले कमले मध्ये विष्णुं लक्ष्मीञ्च केशरे ब्रह्माणं भास्करं पृथ्वीं यजेत् स्कन्दं ह्य् अनन्तकं
स्थण्डिल पर बने कमल-मण्डल के मध्य में विष्णु की पूजा करे; केसर (पराग) में लक्ष्मी की; तथा ब्रह्मा, भास्कर (सूर्य), पृथ्वी, स्कन्द और अनन्तक का भी यजन करे।
Verse 7
खं शिवं सोममिन्द्रादींस्तदस्त्राणि दले क्रमात् वज्रं शक्तिञ्च दण्डञ्च तोमरं पाशकं गदां
फिर क्रम से दलों में ‘ख’, शिव, सोम, इन्द्र आदि तथा उनके अस्त्रों का विन्यास करे; और वज्र, शक्ति, दण्ड, तोमर, पाश तथा गदा (इन शस्त्रों) को भी स्थापित करे।
Verse 8
शूलं पद्मम्बहिर्वृन्ते चक्रे सूर्यन्तथाश्विनौ वसूनष्ठौ तथा साध्यान् याम्ये ऽथ नैरृते दले
कमल के बाह्य वृन्त पर शूल स्थापित करे। चक्र में सूर्य तथा दोनों अश्विनौ को रखे; आठ वसुओं को भी, और साध्यों को—दक्षिण तथा नैऋत्य दलों में—विन्यस्त करे।
Verse 9
देवानाङ्गिरसश्चाश्विभृगवो मरुतो ऽनिले विश्वेदेवांस् तथा दक्षे रुद्रा शैद्रे ऽथ मण्डले
अनिल-प्रदेश में देव, आङ्गिरस, अश्विन, भृगु और मरुतों को रखे; दक्षिण दिशा में विश्वेदेवों को; और इन्द्र-दिशा में रुद्रों को—इस प्रकार मण्डल में विन्यास करे।
Verse 10
ततो वृत्तया रेखया तु देवान् वै वाह्यतो यजेत् सूत्रकारानृषीन् वाणीं पूर्वादौ सरितो गिरीन्
तदनन्तर वृत्ताकार रेखा द्वारा बाह्य भाग में देवताओं का यजन करे; सूत्रकारों, ऋषियों और वाणी (सरस्वती) की भी पूजा करे; तथा पूर्व से आरम्भ कर नदियों और पर्वतों का भी पूजन करे।
Verse 11
महाभूतानि कोणेषु ऐशान्यादिषु संयजेत् पद्मं चक्रं गदां शङ्खं चतुरश्रन्तु मण्डलं
ईशान (उत्तर-पूर्व) आदि कोण-दिशाओं में महाभूतों की विधिपूर्वक स्थापना/संयोजन करे। मण्डल चतुरस्र (वर्गाकार) हो और उसमें पद्म, चक्र, गदा तथा शंख अंकित/स्थापित हों।
Verse 12
चतुर्धारं ततः कुम्भाः अग्न्यादौ च पताकिकाः चत्वारस्तोरणा द्वारि नागान् ऐरवतादिकान्
तदनन्तर चार धाराओं (जल-प्रवाह) से युक्त कुम्भ स्थापित करे और अग्नि-आदि (पूर्व) दिशा में छोटी पताकाएँ रखे। द्वार पर चार तोरण लगाए तथा ऐरावत आदि नागों का चित्रण/स्थापन करे।
Verse 13
पूर्वादौ चौषधीभिश् च देवानां भाजनं पृथक् पृथक्शताहुतीश्चाज्यैर् गजानर्च्य प्रदक्षिणं
पूर्व दिशा से आरम्भ करके, औषधियों सहित, देवताओं के लिए पृथक्-पृथक् पात्र (भाजन) रखे। फिर घृत से प्रत्येक के लिए सौ-सौ आहुतियाँ दे, गजों की पूजा करे और प्रदक्षिणा (दक्षिणावर्त) करे।
Verse 14
नागं वह्निं देवतादीन् वाह्यैर् जग्मुः स्वकं गृहम् द्विजेभ्यो दिक्षिणां दद्यात् हयवैद्यादिकस् तथा
नाग, अग्नि तथा अन्य देवताओं का विसर्जन करके वे अपने-अपने वाहनों सहित अपने धाम को गए। तत्पश्चात् द्विजों (ब्राह्मणों) को नियत दक्षिणा दे, और उसी प्रकार अश्व-वैद्य आदि विशेषज्ञों को भी।
Verse 15
करिणीन्तु समारुह्य वदेत् कर्णन्तु कालवित् मरुतो ऽनल इति ज चतुःकुम्भा इति ञ पताकिन इति ज नागराजे ऽमृते शान्तिं कृत्वामुस्मिन् जपेन्मनुम्
करिणी (हथिनी) पर आरूढ़ होकर काल-विद् (समय-ज्ञ) कर्ण में कहे— ‘मरुतः, अनल’ (ज-कार सहित), ‘चतुःकुम्भा’ (ञ-कार सहित) और ‘पताकिन’ (ज-कार सहित)। नागराज अमृत के लिए शान्ति-कर्म करके, उसी प्रसंग में निर्धारित मन्त्र का जप करे।
Verse 16
श्रीगजस्त्वं कृतो राज्ञा भवानस्य गजाग्रणीः प्रभूर्माल्याग्रभक्तैस्त्वां पूजयिष्पति पार्थिवः
राजा ने तुम्हें शुभ राजहाथी नियुक्त किया है; तुम उसके हाथियों में अग्रणी हो। वह नरेश तुम्हारी पूजा मालाओं और उत्तम भोग से करेगा।
Verse 17
लोकस्तदाज्ञया पूजां करिष्यति तदा तव पालनीयस्त्वया राजा युद्धे ऽध्वनि तथा गृहे
उसकी आज्ञा से लोग तब तुम्हारी पूजा करेंगे। इसलिए तुम्हें राजा की रक्षा करनी चाहिए—युद्ध में, मार्ग में तथा घर में भी।
Verse 18
तिर्यग्भावं समुत्सृज्य दिव्यं भावमनुस्मर देवासुरे पुरा युद्धे श्रीगजस्त्रिदशैः कृतः
पशु-भाव को त्यागकर दिव्य भाव का स्मरण करो। देवों और असुरों के प्राचीन युद्ध में ‘श्रीगज’ त्रिदशों द्वारा स्थापित किया गया था।
Verse 19
ऐरावणसुतः श्रीमानरिष्टो नाम वारणः श्रीगजानान्तु तत् तेजः सर्वमेवोपतिष्ठते
ऐरावण का पुत्र, ‘अरिष्ट’ नामक श्रीमान हाथी—शुभ राजहाथियों में वही समस्त तेज और सामर्थ्य पूर्णतः विद्यमान रहता है।
Verse 20
तत्तेजस्तव नागेन्द्र दिव्यभावसमन्वितं उपतिष्ठतु भद्रन्ते रक्ष राजानमाहवे
हे नागेन्द्र! तुम्हारा वह तेज, दिव्य भाव से युक्त, तुम्हारे कल्याण हेतु प्रकट हो; और युद्ध में राजा की रक्षा करो।
Verse 21
इत्येवमभिषिक्तैनमारोहेत शुभे नृपः तस्यानुगमनं कुर्युः सशस्त्रनवसद्गजाः
इस प्रकार विधिपूर्वक अभिषिक्त होकर राजा शुभ आसन/वाहन पर आरूढ़ हो। उसके पीछे शस्त्रधारी परिचारकों सहित नौ उत्तम हाथी चलें।
Verse 22
शालास्वसौ स्थण्डिले ऽब्जे दिकपालादीन् यजेद्वहिः केशरेषु बलं नागं भुवञ्चैच सरस्वतीं
यज्ञशाला के स्थण्डिल में बने कमल-मण्डल पर दिक्पाल आदि देवताओं का पूजन करे। और बाहर, केसर/दल-रेखाओं पर बल, नाग, भुव तथा सरस्वती की भी आराधना करे।
Verse 23
मध्येषु डिण्डिमं प्रार्च्य गन्धमाल्यानुलेपनैः हुत्वा देयस्तु कलसो रसपूर्णो द्विजाय च
मध्यभाग में पहले डिण्डिम (नगाड़े) का गन्ध, माला और अनुलेपन से पूजन करे। फिर हवन करके रस से पूर्ण कलश ब्राह्मण को भी प्रदान करे।
Verse 24
गजाध्यक्षं हस्तिपञ्च गणितज्ञञ्च पूजयेत् गजाध्यक्षाय तन्दद्यात् डिण्डिमं सोपि वादयेत् शुभगम्भीरशब्दैः स्याज्जघनस्थो ऽभिवादयेत्
गजाध्यक्ष, पाँच हस्ति-परिचारक तथा गणित-विशारद का सम्मान करे। गजाध्यक्ष को डिण्डिम (नगाड़ा) दे; वह भी शुभ, गम्भीर ध्वनियों से उसे बजवाए और पीछे खड़ा होकर अभिवादन करे।
A veterinary-ritual protocol for preventing and suppressing elephant diseases (gajaroga-vimardanī), combining therapeutic sprinkling, herb-based offerings, and structured homa within a mandala-based worship system.
It sacralizes the royal elephant as a protector of kingship: the rite culminates in consecration, protective invocations, and a procession framework (armed attendants and signal drum) that stabilizes public order and royal safety.
Viṣṇu and Śrī anchor the rite; major devas (Brahmā, Śiva, Indra, Kubera, Yama), luminaries (Sun/Moon), elements, Dikpālas, and Nāga lineages (notably Airāvata and the Nāga-king Amṛta) are installed through a directional mandala schema.