Adhyaya 281
AyurvedaAdhyaya 28113 Verses

Adhyaya 281

Vṛkṣāyurveda (The Science of Plant-Life) — Tree Placement, Muhūrta, Irrigation, Spacing, and Plant Remedies

इस अध्याय में रस-विचार के बाद वृक्षायुर्वेद को धर्मसम्मत विद्या के रूप में बताया गया है। धन्वन्तरि शुभ वृक्षों की दिशा-स्थापना कहते हैं—प्लक्ष उत्तर में, वट पूर्व में, आम्र दक्षिण में, अश्वत्थ पश्चिम/जलाभिमुख; दक्षिण ओर काँटेदार वृद्धि अशुभ है, उसके शमन हेतु तिल या पुष्पवाले पौधे लगाने का विधान है। रोपण में संस्कारपूर्वक पूजा—ब्राह्मण-सत्कार, चन्द्र, ध्रुव/स्थिर तारे, दिशाएँ और देव-विशेष की अर्चना, उचित नक्षत्र-चयन तथा जड़ों की रक्षा—आवश्यक है। क्षेत्र-समृद्धि हेतु जल-व्यवस्था का विधान है: धाराओं का मार्ग, कमल-सर/तालाब निर्माण और जलाशय आरम्भ के लिए शुभ नक्षत्रों की सूची। आगे ऋतु अनुसार सिंचाई, उत्तम-मध्यम दूरी, प्रतिरोपण की सीमा, तथा फलहीनता रोकने हेतु छँटाई बताई गई है। अंत में रोग-शमन व पुष्प-फल-वृद्धि के लिए उपचार—विडंग-घृत लेप, धान्य/दलहन मिश्रण, दूध-घी से सिंचन, गोबर व सत्तू/आटा, किण्वित मांस-जल और मछली-जल आदि—दिए गए हैं।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे रसादिलक्षणं नामाशीत्यधिकद्विसततमो ऽध्यायः अथैकाशीत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः वृक्षायुर्वेदः धन्वन्तरिर् उवाच वृक्षायुर्वेदमाख्यास्ये प्लक्षश्चोत्तरतः शुभः प्राग्वटो याम्यतस्त्वाम्र आप्ये ऽश्वत्थः कर्मेण तु

इस प्रकार श्रीआग्नेय महापुराण में ‘रसादि-लक्षण’ नामक 280वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 281वाँ अध्याय ‘वृक्षायुर्वेद’ आरम्भ होता है। धन्वन्तरि बोले—मैं वृक्षायुर्वेद का वर्णन करूँगा। शुभ प्लक्ष को उत्तर दिशा में, वट को पूर्व में, आम्र को दक्षिण में और अश्वत्थ को पश्चिम (जल-सम्बन्धी) दिशा में विधिपूर्वक स्थापित करना चाहिए।

Verse 2

दक्षिणां दिशमुत्पन्नाः समीपे कण्टकद्रुमाः उद्यानं गृहवासे स्यात् तिलान् वाप्यथ पुष्पितान्

यदि दक्षिण दिशा में पास ही काँटेदार वृक्ष उग आए हों, तो उस घर में निवास में विघ्न/अशुभता होती है; इसलिए वहाँ तिल अथवा पुष्पित पौधे लगाना चाहिए।

Verse 3

गृह्णीयाद्रोपयेद्वृक्षान् द्विजञ्चन्द्रं प्रपूज्य च ध्रुवाणि पञ्च वायव्यं हस्तं प्राजेशवैष्णवं

(पौधों को) लेकर विधिपूर्वक वृक्षों का रोपण करे; और ब्राह्मण तथा चन्द्रमा की सम्यक् पूजा करके, पाँच ध्रुव (स्थिर बिन्दु/तारे), वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा, हस्त नक्षत्र तथा प्राजेश और वैष्णव (देव-तत्त्व) की भी पूजा करे।

Verse 4

नक्षत्राणि तथा मूलं शस्यन्ते द्रुमरोपणे प्रवेशयेन्नदीवाहान् पुष्करिण्यान्तु कारयेत्

वृक्षारोपण में (उचित) नक्षत्रों तथा मूल (जड़/रोपण-भाग) का विचार प्रशंसित है। (स्थल में) नदी-धाराओं का प्रवाह प्रवेश कराए और एक पुष्करिणी (कमल-सर/जलाशय) बनवाए।

Verse 5

गृहवामे इति ञ पुष्करिण्यान्त्विति पाठो न सम्यक् प्रतिभाति हस्ता मघा तथा मैत्रमाद्यं पुष्यं सवासवं जलाशयसमारम्भे वारुणञ्चोत्तरात्रयम्

‘गृहवामे…’ यह पाठ अस्पष्ट है; ‘पुष्करिण्यान्त्व…’ यह पाठ भी ठीक प्रतीत नहीं होता। जलाशय-निर्माण के आरम्भ में हस्त, मघा, मैत्र (अनुराधा), उत्तरा का प्रथम (उत्तराफाल्गुनी), पुष्य और वासव (श्रवण) शुभ हैं; तथा वारुण (शतभिषज) और शेष तीन उत्तरा नक्षत्र भी ग्राह्य हैं।

Verse 6

संपूज्य वरुणं विष्णुं पर्जन्यं तत् समाचरेत् अरिष्टाशोकपुन्नागशिरीषाः सप्रियङ्गवः

वरुण, विष्णु और पर्जन्य का विधिवत् पूजन करके फिर उस कर्म का आचरण करे। अरिष्ट, अशोक, पुन्नाग, शिरीष तथा प्रियंगु आदि शुभ वनस्पतियों का प्रयोग करे।

Verse 7

अशोकः कदली जम्बुस् तथा वकुलदाडिमाः सायं प्रातस्तु घर्मर्तौ शीतकाले दिनान्तरे

अशोक, कदली (केला), जम्बू, तथा वकुल और दाड़िम—गर्मी के ऋतु में इन्हें सायं और प्रातः लेना चाहिए; पर शीतकाल में दिन के अंत में (अर्थात् देर से) लेना चाहिए।

Verse 8

वर्षारत्रौ भुवः शोषे सेक्तव्या रोपिता द्रुमाः उत्तमं विंशतिर्हस्ता मध्यमं षोडशान्तरम्

वर्षाकाल में तथा जब भूमि सूख जाए तब रोपे हुए वृक्षों को सींचना चाहिए। उत्तम दूरी बीस हस्त है और मध्यम दूरी सोलह हस्त (के अंतर) की है।

Verse 9

स्थानात् स्थानान्तरं कार्यं वृक्षाणां द्वादशावरं विफलाः स्युर्घना वृक्षाः शस्त्रेणादौ हि शोधनम्

वृक्षों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रत्यारोपण बारह (निर्धारित) अवधि/माप से अधिक न हो, इस प्रकार करना चाहिए। घने, बढ़े हुए वृक्ष प्रायः निष्फल हो जाते हैं; इसलिए आरम्भ में शस्त्र द्वारा शोधन—अर्थात् छँटाई/कटाई—करनी चाहिए।

Verse 10

विडङ्गघृतपङ्काक्तान् सेचयेच्छीतवारिणा फलनाशे कुलथैश् च मासैर् मुद्गैर् यवैस्तिलैः

फल नष्ट होने लगे तो विदंग को घृत में मिलाकर लेप (पंक) बनाकर वृक्ष/पौधे पर लगावे और फिर शीतल जल से सिंचन करे; तथा कुलथ, माष, मुद्ग, यव और तिल आदि से भी उपचार करे।

Verse 11

घृतशीतपयःसेकः फलपुष्पाय सर्वदा आविकाजशकृच्चूर्णम् यवचूर्णं तिलानि च

फल-फूल की वृद्धि के लिए सदा घी मिले ठंडे दूध से सिंचन करें; साथ ही भेड़/बकरी की लीद का चूर्ण, जौ का आटा और तिल भी डालें।

Verse 12

गोमांसमुदकञ्चैव सप्तरात्रं निधापयेत् उत्सेकः सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदः

गोमांस और जल को सात रात तक रखकर (किण्वित) करें; उससे सिंचन करने पर सभी वृक्षों में फल, फूल आदि की वृद्धि होती है।

Verse 13

मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनः विडङ्गतण्डुलोपेतं मत्स्यं मांसं हि दोहदं सर्वेषामविशेषेण वृक्षाणां रोगमर्दनम्

मछली के जल से सिंचन करने पर वृक्षों की वृद्धि होती है। विडंग और चावल के दानों सहित मछली व मांस का ‘दोहद’ पोषक लेप है, जो सभी वृक्षों के रोगों को दबाता है।

Frequently Asked Questions

Plakṣa is placed to the north, vaṭa (banyan) to the east, mango to the south, and aśvattha (pipal) to the west/waterward direction, performed according to proper ritual procedure.

The text states this causes disturbance/inauspiciousness for dwelling; it recommends planting sesame (tila) or flowering plants there as a remedial measure.

Hastā, Maghā, Maitra (Anurādhā), the first of the Uttaras, Puṣya, and Vāsava (Śravaṇa); additionally Vāruṇa (Śatabhiṣaj) and the remaining three Uttara asterisms are also acceptable.

The best spacing is twenty hastas; the medium spacing is sixteen hastas.

It notes that overly dense trees become fruitless and prescribes early ‘purification’ through cutting—i.e., pruning/thinning with a tool.

For fruit destruction: apply a vidanga–ghee paste and irrigate with cool water, with adjunct use of legumes/grains (kulattha, māṣa, mudga, yava, tila). For flowering/fruiting: irrigate with cooled milk mixed with ghee, and apply powdered sheep/goat dung, barley flour, and sesame; additionally, seven-night fermented cow-meat water and fish-water irrigation are described as growth-promoting and disease-suppressing.