Adhyaya 241
Vana ParvaAdhyaya 24132 Verses

Adhyaya 241

Bhīṣma’s Admonition; Duryodhana’s Rājasūya Aspiration and the Proposal of a Vaiṣṇava-satra

Upa-parva: Gandharva-episode aftermath: Dhṛtarāṣṭra–Karṇa counsel and the proposed Vaiṣṇava-satra (Rājasūya-equivalent)

Janamejaya asks what the Kaurava leaders did while the Pandavas resided in the forest. Vaiśaṃpāyana reports that after the Gandharva incident and the Pandavas’ intervention, Bhīṣma addresses Duryodhana with a corrective assessment: he had earlier advised against the forest venture; Duryodhana was seized by enemies and released by the dharma-aligned Pandavas, yet shows no shame. Bhīṣma highlights that Karṇa retreated in fear during the Gandharva battle, underscoring the limits of their martial standing relative to the Pandavas. Bhīṣma recommends a settlement (saṃdhi) with the Pandavas for the growth of the Kuru line. Duryodhana departs with Śakuni; Karṇa and Duḥśāsana follow. Bhīṣma withdraws in embarrassment. Duryodhana then consults ministers on what is beneficial. Karṇa encourages him to rule as unrivaled and proposes initiating a major sacrifice. Duryodhana expresses desire for a Rājasūya like Yudhiṣṭhira’s; Karṇa supports preparations and summons priests. The purohita refuses: a Rājasūya is not feasible while Yudhiṣṭhira lives and while Dhṛtarāṣṭra remains alive, citing precedence and conflict with propriety. He proposes an alternative great rite, a Vaiṣṇava-satra comparable to Rājasūya, funded by tribute and requiring preparation of the yajña-ground (including ploughing). The court approves; the king assigns tasks; artisans are ordered to execute the required implements and arrangements.

Chapter Arc: दुर्योधन अपनी विशाल सेना सहित वन में ‘घोषयात्रा’ के लिए आता है—गौओं की देखभाल और शिकार-विहार के बहाने, पर भीतर-भीतर पाण्डवों को दिखाकर अपमानित करने का गर्व भी साथ चलता है। → रमणीय, जल-वनस्पति से भरपूर देश में कौरवों के अलग-अलग शिविर सजते हैं—दुर्योधन के निकट कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि; फिर वे चारों ओर वन्य पशुओं का शिकार करते हुए पुण्य-प्रसिद्ध द्वैतवन-सरोवर की ओर बढ़ते हैं और वहाँ क्रीड़ा-स्थल बनवाने की आज्ञा देते हैं। → द्वैतवन के क्षेत्र में गन्धर्वों से सामना होता है; गन्धर्व दूत कौरव सैनिकों को फटकारते हैं—‘तुम्हारा राजा मूर्ख है, देवलोकवासी गन्धर्वों को बनियों की तरह समझकर आदेश दे रहा है’—और चेतावनी देते हैं कि तुरंत लौटो, नहीं तो परिणाम भोगो। → गन्धर्वों की कठोर वाणी सुनकर कौरव सेना के अग्रणी योद्धा घबरा उठते हैं और जहाँ धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन है, उसी ओर भागकर सूचना देने दौड़ते हैं। → गन्धर्वों की चेतावनी के बाद दुर्योधन क्या झुकेगा या अहंकार में टकराव को बुलाएगा—यह संकट अगले प्रसंग में फूटने को तैयार है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न (0) हि 7 2 चत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वो्में परस्पर कटु संवाद वैशम्पायन उवाच अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन्‌ | जगाम घोषानभितत्तत्र चक्रे निवेशनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ-तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों (गोशालाओं)-के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली

વૈશંપાયન બોલ્યા— જનમેજય! ત્યારબાદ રાજા દુર્યોધન વનમાં સ્થળે સ્થળે પડાવ નાખતો ઘોષો (ગોપવસતિઓ/ગોશાળાઓ) પાસે પહોંચ્યો અને ત્યાં તેણે પોતાની છાવણી ગોઠવી.

Verse 2

रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरुहे । देशे सर्वगुणोपेते चक्कुरावसथान्‌ परा:,उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये

તેની સાથે ગયેલા લોકોએ પણ સર્વગુણસંપન્ન, રમણીય, સુપરિચિત, જલસમૃદ્ધ અને ઘન વૃક્ષાવલિયુક્ત તે પ્રદેશમાં પોતાના ડેરા ગોઠવ્યા.

Verse 3

तथैव तत्समीपस्थान्‌ पृथगावसथान्‌ बहुन्‌ कर्णस्य शकुने श्वैव ३ 2७ | चैव सर्वश:,इसी प्रकार दुर्योधनके डेकके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ बहुत-से खेमे पड़ गये

એ જ રીતે દુર્યોધનના ડેરાની નજીક જ કર્ણ, શકુનિ તથા દુઃશાસન વગેરે સૌ માટે અલગ અલગ અનેક ખેમા ગોઠવાયા.

Verse 4

ददर्श स तदा गाव: शतशो5थ सहस््रश: । अड्कैरल॑क्षैश्ष ता: सर्वा लक्षयामास पार्थिव:,(रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया। उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी

ત્યારે રાજાએ પોતાની ગાયો સૈકડાઓ અને હજારોમાં જોઈ. તેણે બધાં પર સંખ્યા-ચિહ્નો અને ઓળખનાં નિશાન લગાવી તેમને ચિહ્નિત કરાવ્યાં.

Verse 5

अड्कयामास वसत्सांश्व॒ जज्ञे चोपसूतांस्त्वपि । बालवसत्साश्न या गाव: कालयामास ता अपि,फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी। जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी

તેણે વાછરડાં પર પણ સંખ્યા-ચિહ્ન લગાવ્યાં અને નવી પ્રસૂતા ગાયોનું પણ યોગ્ય રીતે ગણતરી કરાવી. જેમના વાછરડાં બહુ નાનાં હતાં એવી ગાયો પણ અલગથી નોંધાવીને જુદી રાખી.

Verse 6

अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान्‌ | वृतो गोपालकै: प्रीतो व्यहरत्‌ कुरुनन्दन:,इस प्रकार जाँच-पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक्‌ गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा

પછી સ્મરણાર્થે બધું લખાવીને અને ત્રણ વર્ષનાં વાછરડાંને અલગથી ચિહ્નિત કરાવી, કુરુનંદન દુર્યોધન પ્રસન્ન થઈ ગોપાલકોની વચ્ચે તે વનમાં વિહાર કરવા લાગ્યો.

Verse 7

स च पौरजन: सर्व: सैनिकाश्न सहस्रश: | यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन्‌ यथामरा:,वे समस्त पुरवासी और सहस्रोंकी संख्यामें आये हुए सैनिक उस वनमें अपनी-अपनी रुचिके अनुसार देवताओंके समान क्रीड़ा करने लगे

અને બધા નગરવાસીઓ તથા હજારોની સંખ્યામાં આવેલા સૈનિકો, તે વનમાં પોતાની-પોતાની રુચિ મુજબ દેવતાઓની જેમ ક્રીડા કરવા લાગ્યા.

Verse 8

ततो गोपा: प्रगातार: कुशला नृत्यवादने । धार्रराष्ट्रमुपातिष्ठन्‌ कन्याश्वैव स्वलंकृता:,तदनन्तर नृत्य और वादनकी कलामें कुशल कुछ गवैये गोप तथा गहने-कपड़ोंसे सजी हुई उनकी कन्याएँ दुर्योधनके समीप आयीं

પછી નૃત્ય, ગાન અને વાદનમાં નિપુણ કેટલાક ગોપગાયક અને આભૂષણો તથા વસ્ત્રોથી સજ્જ તેમની કન્યાઓ ધાર્તરાષ્ટ્ર દુર્યોધનના સમીપ આવ્યા.

Verse 9

स स्त्रीगणावृतो राजा प्रदह्ृष्ट: प्रददौ वसु । तेभ्यो यथाहमन्नानि पानानि विविधानि च,अपनी स्त्रियोंके साथ राजा दुर्योधन उनको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत- सा धन दिया तथा यथायोग्य नाना प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित की

સ્ત્રીગણથી ઘેરાયેલા રાજા દુર્યોધન તેમને જોઈ અત્યંત પ્રસન્ન થયો. તેણે તેમને ઘણું ધન આપ્યું અને યથોચિત રીતે નાનાપ્રકારનાં અન્ન-પાન અર્પણ કર્યા.

Verse 10

ततस्ते सहिता: सर्वे तरक्षून्‌ महिषान्‌ मृगान्‌ । गवयर्क्षवराहांश्व समन्तात्‌ पर्यकालयन्‌,तदनन्तर वे सब लोग तरक्षुओं (जरखों), जंगली भैंसों, गवयों, रीछों और शूकरों एवं अन्य जंगली हिंसक पशुओंका सब ओरसे शिकार करने लगे

ત્યારબાદ તેઓ બધા મળીને ચારે તરફથી ઘેરીને તરક્ષુઓ (જરખ), જંગલી મહિષો, મૃગો, ગવયો, રીંછો, શૂકરો તથા અન્ય વન્ય પશુઓનો શિકાર કરવા લાગ્યા.

Verse 11

स ताउछरैविनिर्भिद्य गजांश्व सुबहून्‌ वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान्‌,उन्होंने वनके रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से हाथियोंको अपने बाणोंसे विदीर्ण करके अनेकानेक हिंस्र पशुओंको पकड़ लिया

તેણે વનમાં ઉપરથી બાણો વડે ભેદીને ઘણા હાથીઓ અને ઘોડાઓને પાડી દીધા; અને રમણીય પ્રદેશોમાં વન્ય પશુઓને પકડાવ્યા.

Verse 12

गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्व भारत । पश्यन्‌ स रमणीयानि वनान्युपवनानि च,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा

હે ભરતનંદન! દુર્યોધન પોતાના સાથીઓ સાથે દૂધ વગેરે ગોરસોનો ઉપભોગ કરતો અને નાનાપ્રકારના ભોગ ભોગવતો ત્યાંનાં રમણીય વનો અને ઉપવનોની શોભા જોવા લાગ્યો.

Verse 13

मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतववनं सर:,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा

હે ભરતનંદન! મત્ત ભમરાઓના ગુંજનથી ભરપૂર અને મોરોના કલરવથી ગુંજતા વનોમાંથી ક્રમે આગળ વધતો તે પરમ પુણ્ય દ્વૈતવન નામના સરોવર પાસે જઈ પહોંચ્યો.

Verse 14

मत्तभ्रमरसंजुष्ट नीलकण्ठरवाकुलम्‌ । सप्तच्छदसमाकीर्ण पुन्नागबकुलैर्युतम्‌,वहाँ मधुमत्त भ्रमर कमलपुष्पोंका रस ले रहे थे। मयूरोंकी मधुर वाणीसे वह सारा प्रदेश व्याप्त हो रहा था। सप्तच्छद (छितवन)-के वृक्षोंसे वह सरोवर आच्छादित-सा जान पड़ता था। उसके तटोंपर मौलसिरी और नागकेसरके वृक्ष शोभा पा रहे थे

ત્યાં મત્ત ભમરાઓ કમળપુષ્પોના મધુર રસનું પાન કરતા હતા અને મોરોના મધુર કલરવથી આખો પ્રદેશ ગુંજી ઊઠ્યો હતો. સપ્તચ્છદ વૃક્ષોથી તે સરોવર જાણે ઢંકાઈ ગયું હોય તેમ લાગતું હતું અને તેના કાંઠા પુન્નાગ તથા બકુલ વૃક્ષોથી શોભિત હતા.

Verse 15

ऋद्धया परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत्‌ । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

પરમ સમૃદ્ધિથી યુક્ત, વજ્રધારી મહેન્દ્ર સમાન ધર્મપુત્ર યુધિષ્ઠિર યદૃચ્છાએ ત્યાં જ નિવાસ કરી રહ્યો હતો.

Verse 16

ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

હે પ્રજાપતિ, હે કુરુશ્રેષ્ઠ! ત્યાં તેમણે સાદ્યસ્ક રાજર્ષિયજ્ઞ કર્યો—વનમાં સહેલાઈથી મળતી સામગ્રીથી, દિવ્ય અને વિધિપૂર્વક.

Verse 17

(विद्वद्धिः सहितो धीमान्‌ ब्राह्मुणैर्वनवासिभि: ।) कृत्वा निवेशमभित: सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान्‌ धर्मपत्न्या नराधिप:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान्‌ ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे

હે કૌરવ! વનવાસી વિદ્વાન બ્રાહ્મણો સાથે તે ધીમાન નૃપે તે સરોવરનાં ચારે તરફ નિવાસસ્થાન ગોઠવ્યું; અને ધર્મપત્ની દ્રૌપદી સહિત તે ધીર નરાધિપ ત્યાં જ રહ્યો.

Verse 18

ततो दुर्योधन: प्रेष्यानादिदेश सहस्रश: । आक्रीडावसथा: क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत

ત્યારે દુર્યોધને પોતાના સેવકોને હજારોની સંખ્યામાં આદેશ આપ્યો—“હે ભારત! ક્રીડાભૂમિ અને નિવાસસ્થાન તાત્કાલિક તૈયાર કરો.”

Verse 19

भारत! तदनन्तर दुर्योधनने अपने सहस्रों सेवकोंको आज्ञा दी--'तुमलोग बहुत-से क्रीडामण्डप तैयार करो” ।। ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिण: । चिकीर्षन्तस्तदा55क्रीडाञ्जम्मुर्दतवनं सर:,आज्ञाकारी सेवक दुर्योधनसे “तथास्तु'” कहकर क्रीडाभवन बनानेकी इच्छासे द्वैतवनके सरोवरके निकट गये

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—ત્યારબાદ દુર્યોધને પોતાના સહસ્ર સેવકોને આજ્ઞા આપી—“ઘણા ક્રીડામંડપ તૈયાર કરો.” તેઓ “તથાસ્તુ” કહી કૌરવની આજ્ઞા સ્વીકારી, ક્રીડાસજ્જા કરવા ઇચ્છતા દ્વૈતવનના સરોવર પાસે ગયા।

Verse 20

प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वा: समवारयन्‌ | सेनाग्रयं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सर:,दुर्योधनका सेनानायक द्वैतवन सरोवरके अत्यन्त निकटतक पहुँच गया था, उस वनके द्वारपर पैर रखते ही उसको गन्धर्वोने रोक दिया

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—ધૃતરાષ્ટ્રપુત્રની સેનાનો અગ્રભાગ દ્વૈતવનના સરોવર સુધી આવી, વનદ્વારેથી પ્રવેશ કરવા લાગ્યો ત્યારે ગંધર્વોએ માર્ગ રોકી દીધો।

Verse 21

तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते । कुबेरभवनाद्‌ राजन्नाजगाम गणावृतः,राजन! वहाँ गन्धर्वराज चित्रसेन पहलेसे ही अपने सेवकगणोंके साथ कुबेरभवनसे आये हुए थे

રાજન! ત્યાં ગંધર્વરાજ ચિત્રસેન પહેલેથી જ પોતાના ગણોથી ઘેરાયેલો કૂબેરભવનમાંથી આવી પહોંચ્યો હતો।

Verse 22

गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथा55त्मजै: । विहारशील: क्रीडार्थ तेन तत्‌ संवृतं सर:,वे उन दिनों अप्सराओं तथा देवकुमारोंके साथ विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण करते थे। उन्होंने स्वयं ही क्रीड़ाविहारके लिये उस सरोवरको सब ओरसे घेर लिया था

તે અપ્સરાઓના ગણો તથા દેવપુત્રો સાથે વિહાર કરનાર હતો. ક્રીડાવિહાર માટે તેણે તે સરોવર ચારેય બાજુથી ઘેરી રાખ્યું હતું।

Verse 23

तेन तत्‌ संवृतं दृष्टवा ते राजपरिचारका: । प्रतिजग्मुस्ततो राजन्‌ यत्र दुर्योधनो नूप:,राजन्‌! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'

રાજન! તે સરોવર ગંધર્વરાજે ઘેરેલું જોઈ રાજપરિચારકો જ્યાં રાજા દુર્યોધન હતો ત્યાં પાછા ફર્યા।

Verse 24

स तु तेषां वच: श्रुत्वा सैनिकान्‌ युद्धदुर्मदान्‌ प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति,राजन्‌! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'

વૈશંપાયન બોલ્યા—સેવકોનો અહેવાલ સાંભળીને કૌરવરાજ દુર્યોધને યુદ્ધગર્વથી મત્ત થયેલા સૈનિકોને મોકલી આ આજ્ઞા આપી—“તેમને ત્યાંથી હાંકી કાઢો!” હે રાજન, તે સરોવર ગંધર્વરાજ દ્વારા ઘેરાયેલું જોઈ રાજસેવકો જ્યાં રાજા દુર્યોધન હતો ત્યાં પાછા ફર્યા. હે જનમેજય, સેવકોના શબ્દો સાંભળીને દુર્યોધને યુદ્ધોન્મત્ત દળોને મોકલી કહ્યું—“ગંધર્વોને મારીને તે સ્થાનેથી દૂર હટાવો.”

Verse 25

तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्‌,राजाका यह आदेश सुनकर उसकी सेनाके नायक द्वैतवन सरोवरके समीप जाकर गन्धर्वोंसे इस प्रकार बोले--

રાજાની તે આજ્ઞા સાંભળીને સેના-અગ્રણી નાયકો દ્વૈતવનના સરોવર પાસે ગયા અને ગંધર્વોને આ રીતે કહ્યું.

Verse 26

राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली । विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत,“गन्धर्वो! महाराज धृतराष्ट्रके बलवान्‌ पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ विहार करनेकी इच्छासे पधार रहे हैं। तुमलोग उनके लिये यह स्थान खाली करके दूर चले जाओ'

“હે ગંધર્વો! મહારાજ ધૃતરાષ્ટ્રના બળવાન પુત્ર રાજા દુર્યોધન અહીં વિહાર કરવાની ઇચ્છાથી આવી રહ્યા છે. તેથી આ સ્થાન ખાલી કરીને દૂર હટી જાઓ.”

Verse 27

एवमुक्तास्तु गन्धर्वा: प्रहसन्तो विशाम्पते | प्रत्यब्रुवंस्तान्‌ पुरुषानिदं हि परुषं वच:,राजन्‌! उनके ऐसा कहनेपर गन्धर्व जोर-जोरसे हँसने लगे; और उन राजसेवकोंको उत्तर देते हुए उनसे इस प्रकार कठोर वाणीमें बोले--

હે પ્રજાપતિ, એમ કહેવાતાં ગંધર્વો ઠહાકા મારી હસ્યા; અને પછી રાજસેવકોને જવાબ આપતાં કઠોર વાણીમાં આ રીતે બોલ્યા.

Verse 28

न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धि: सुयोधन: । योअस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकस:

“તમારો રાજા સુયોધન મંદબુદ્ધિ છે; તે જરાય વિચારતો નથી—સ્વર્ગવાસી દિવ્યજન એવા અમને પણ આ રીતે આદેશ આપે છે, જાણે અમે કોઈ સામાન્ય વૈશ્ય હોઈએ!”

Verse 29

“तुम्हारा राजा दुर्योधन मूर्ख है। उसे तनिक भी चेत नहीं है; क्योंकि वह हम देवलोकवासी गन्धर्वको भी बनियोंके समान समझकर इस प्रकार आज्ञा दे रहा है ।। यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशय: । ये तस्य वचनादेवमस्मान्‌ ब्रूत विचेतस:,“तुमलोगोंकी भी बुद्धि मारी गयी है। इसमें संदेह नहीं कि तुम सब-के-सब मरना चाहते हो। तभी तो उस दुर्योधनके कहनेसे तुम इस प्रकार हमसे विचारहीन होकर बातें कर रहे हो

વૈશમ્પાયન બોલ્યા— તમે નિશ્ચયે મૃત્યુ તરફ વળેલા છો અને તમારી બુદ્ધિ મંદ છે— તેમાં શંકા નથી. દુર્યોધનના માત્ર આદેશથી તમે વિવેક વિના અમને આ રીતે સંબોધો છો.

Verse 30

गच्छध्वं त्वरिता: सर्वे यत्र राजा स कौरव: । न चेदद्यैव गच्छथध्वं धर्मराजनिवेशनम्‌,“या तो तुम सब लोग तुरन्त वहीं लौट जाओ, जहाँ तुम्हारा राजा दुर्योधन रहता है। या यदि ऐसा नहीं करना है, तो अभी धर्मराजके नगर (यमलोक) की राह लो”

વૈશમ્પાયન બોલ્યા— તમે બધા ત્વરિત જઈને જ્યાં તે કૌરવ રાજા (દુર્યોધન) છે ત્યાં પહોંચો. નહિ તો, આજેજ ધર્મરાજ (યમ)ના નિવાસ તરફ પ્રસ્થાન કરો.

Verse 31

एवमुक्तास्तु गन्धर्व राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सम्प्राद्रवन्‌ यतो राजा धृतराष्ट्रसुतो&$भवत्‌,गन्धर्वोके ऐसा कहनेपर राजाके सेनानायक योद्धा वहीं भाग गये, जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्वयं विराजमान था

વૈશમ્પાયન બોલ્યા— ગંધર્વરાજે એમ કહ્યે પછી સેનાના અગ્રણી નાયકો તરત જ દોડી ગયા, જ્યાં ધૃતરાષ્ટ્રપુત્ર રાજા દુર્યોધન સ્થિત હતો.

Verse 240

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे चत्वारिंशदधिकद्विशततमो<ध्याय:

આ રીતે શ્રીમહાભારતના વનપર્વના ઘોષયાત્રાપર્વમાં ગંધર્વો અને દુર્યોધનની સેના વચ્ચેના સંવાદપ્રસંગમાં બે સો ચાલીસમો અધ્યાય સમાપ્ત થાય છે.

Frequently Asked Questions

Whether to pursue reconciliation after receiving undeserved rescue (acknowledging obligation and shame) or to convert resentment into a prestige project that competes for status through ritual display.

Ethical authority requires self-assessment and restraint: public humiliation and dependence on rivals should motivate prudence and settlement, not denial and escalation through vanity.

No explicit phalaśruti appears; the meta-function is structural—linking political embarrassment to ritual strategy, showing how legitimacy is negotiated through both conduct and sanctioned ceremonial order.