पितृयज्ञे नारायणतत्त्वम् — The Nārāyaṇa Grounding of Ancestral Offerings
न तत्र पक्षिसंघातो न शब्दो नातिदर्शनम् | यत्र वैयासकिर्धीमान् योक्तुं समुपचक्रमे,थोड़ी ही देरमें जब सूर्योदय हुआ, तब ज्ञानी शुकदेव हाथ-पैर समेटकर विनीतभावसे पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे और योगमें प्रवृत्त हो गये। उस समय बुद्धिमान् व्यास- नन्दन जहाँ योगयुक्त हो रहे थे, वहाँ न तो पक्षियोंका समुदाय था, न कोई शब्द सुनायी पड़ता था और न दृष्टिको आकृष्ट करनेवाला कोई दृश्य ही उपस्थित था
na tatra pakṣi-saṅghāto na śabdo nātidarśanam | yatra vaiyāsakir dhīmān yoktuṃ samupacakrame ||
જ્યાં બુદ્ધિમાન વૈયાસકી શુકદેવ યોગમાં પ્રવેશ કરવા લાગ્યા, ત્યાં ન પક્ષીઓનો ઝુંડ હતો, ન કોઈ શબ્દ, અને ન નજર ખેંચે એવું કોઈ દૃશ્ય જ હતું.
भीष्म उवाच