
Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
Upa-parva: Āstīka-parva (Serpent-Sacrifice Episode)
This chapter presents Āstīka’s formal address within Janamejaya’s sacrificial assembly. He compares the king’s yajña to paradigmatic sacrifices associated with deities (Soma, Varuṇa, Prajāpati, Śakra/Indra, Yama) and exemplary royal patrons (e.g., Rantideva, Gaya, Śaśabindu, Nṛga, and others), repeatedly concluding with an auspicious refrain wishing well-being to the king and his dear ones. The rhetoric then shifts from comparative praise to institutional validation: Āstīka asserts the unmatched status of the officiants, especially Dvaipāyana (Vyāsa), and notes the competence and wide presence of his disciples. The chapter further sacralizes the rite by describing Agni (Hutabhuj) as splendid and properly receiving the oblations. Finally, the praise is redirected to Janamejaya’s qualities as protector and householder of the sacrifice, likening his guardianship and radiance to exemplary figures. The Sūta concludes that the king, priests, and fire are pleased; observing their favorable dispositions, King Janamejaya then speaks—marking a narrative hinge toward the next procedural step.
Chapter Arc: श्रृंगी—महातेजस्वी, तिग्मवीर्य और अतिकोपी—अपने आचार्य के आश्रम से आज्ञा लेकर लौटता है; उधर कुरुवंश के राजा परीक्षित् के भाग्य पर अदृश्य सर्प-छाया घिरने लगती है। → शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी द्वारा दिए गए शाप का वृत्तान्त फैलता है; राजा की रक्षा हेतु कश्यप वैद्य-ब्राह्मण ‘सद्यः अपज्वर’ करने और सर्प-विष को निष्फल करने निकलता है, पर मार्ग में तक्षक उसे लोभ देकर रोकने का षड्यन्त्र रचता है। → तक्षक कश्यप को धन-लोभ में फँसाकर लौटा देता है—और छल से परीक्षित् को डँसकर मृत्यु देता है; धर्म-रक्षा का अवसर हाथ से निकल जाता है और राजवंश पर शोक का वज्रपात होता है। → पिता की मृत्यु का वृत्तान्त सुनकर जनमेजय प्रतिकार का संकल्प करता है: तक्षक का ‘महानतिक्रम’—ब्राह्मण को द्रव्य देकर राजा को न बचाने देना—राजधर्म और लोकधर्म दोनों पर आघात है; वह उत्तंक को प्रिय करने और पितृ-अपचित्ति हेतु आगे बढ़ता है। → जनमेजय का प्रतिशोध किस रूप में फूटेगा—और तक्षक के विरुद्ध कौन-सा यज्ञ-प्रचण्ड विधान उठेगा?
Verse 1
नऔहा-<> ड-ऑ का पज्चाशत्तमो<्ध्याय: शृंगी ऋषिका परीक्षित्को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा मन्त्रिण ऊचु. ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजड़मम् | मुने: क्षुतक्षाम आसज्य स्वपुरं पुनराययौ,मन्त्री बोले--राजेन्द्र! उस समय राजा परीक्षित् भूखसे पीड़ित हो शमीक मुनिके कंधेपर मृतक सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये
જનમેજય બોલ્યો—પછી તે રાજા, હે રાજેન્દ્ર, ભૂખથી અત્યંત ક્ષીણ થઈ, મુનિના ખભા પર એક મરેલો સર્પ મૂકી, ફરી પોતાના નગરમાં પરત આવ્યો। મંત્રીઓ બોલ્યા—રાજેન્દ્ર! તે સમયે રાજા પરીક્ષિત્ ભૂખથી પીડિત થઈ શમીક મુનિના ખભા પર મૃત સર્પ મૂકી ફરી પોતાની રાજધાનીમાં ગયો।
Verse 2
था |] ऋषेस्तस्य तु पुत्रो5भूद् गवि जातो महायशा: । शृज्जी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योडतिकोपन:,उन महर्षिके शृंगी नामक एक महातेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गायके पेटसे हुआ वह महान् यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यन्त क्रोधी था
તે ઋષિને એક પુત્ર હતો, જે ગાયના ગર્ભમાંથી જન્મેલો મહાયશસ્વી હતો. તેનું નામ શૃંગી—મહાતેજસ્વી, તીક્ષ્ણવીર્ય અને અત્યંત ક્રોધી।
Verse 3
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनि: पूजां चकार ह | सोअ&नुज्ञातस्ततस्तत्र शृद्धी शुश्राव तं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
જનમેજય બોલ્યો—એક દિવસે તે (શૃંગી) આચાર્યદેવ પાસે જઈ પૂજા કરી; અને ત્યાંથી આજ્ઞા મળતાં જ, તે સમયે તેણે સાંભળ્યું કે તમારા પિતાએ તેના પિતાનું અપમાન કર્યું હતું. નિર્દોષ, મૌનવ્રતસ્થ તપસ્વી પ્રત્યેની આ અવહેલનાએ આગળ જઈ મહા અનર્થનું બીજ વાવ્યું।
Verse 4
सख्यु: सकाशात् पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा । मृतं सर्प समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम्,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
જનમેજય બોલ્યો—સહાધ્યાયી મિત્ર પાસેથી શૃંગીએ સાંભળ્યું કે અગાઉ તમારા પિતાએ તેના પિતાનું અપમાન કર્યું હતું; અને તે મુનિ થાંભલા સમા નિશ્ચલ બેઠા હતા ત્યારે તેમના ખભા પર એક મૃત સર્પ મૂકવામાં આવ્યો હતો—જ્યારે તેમણે કોઈ અપરાધ કર્યો ન હતો।
Verse 5
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् | तपस्विनमतीवाथ त॑ मुनिप्रवरं नूप,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
જનમેજય બોલ્યો—હે રાજશાર્દૂલ, રાજેન્દ્ર! તે મુનિપ્રવર નિર્દોષ હોવા છતાં ખભા પર નિરુપદ્રવી જીવ વહન કરતો હતો; છતાં મૌન-સમાધિમાં સ્થિત તે મુનિશ્રેષ્ઠ તપસ્વીનું તારા પિતા પરીક્ષિતે અપમાન કર્યું અને તેના ખભા પર મૃત સર્પ મૂકી દીધો.
Verse 6
जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् । तपसा द्योतितात्मान स्वेष्वड्रेषु यतं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
તે સમયે તે જિતેન્દ્રિય અને વિશુદ્ધ હતો, પોતાના નિયત કર્મમાં સ્થિર હતો અને અદ્ભુત તેજથી યુક્ત હતો; તપસ્યાથી તેની આત્મસત્તા દીપ્ત હતી અને તેના અંગો સંયમમાં બંધાયેલા હતા.
Verse 7
शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् । अक्षुद्रमनसूयं च वृद्ध मौनव्रते स्थितम् । शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया
તે શુભાચારવાળો, શુભવક્તા, સુસ્થિર અને અલોલુપ હતો; ક્ષુદ્રતા વિનાનો, દોષદૃષ્ટિ વિનાનો અને અસૂયારહિત; વૃદ્ધ અને મૌનવ્રતમાં સ્થિત; સર્વ ભૂતોનો શરણ્ય—એવા મુનિ સાથે તારા પિતાએ અન્યાય કર્યો.
Verse 8
शशापाथ महातेजा: पितरं ते रुषान्वित: । ऋषे: पुत्रो महातेजा बालोडपि स्थविरण्युति:,यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वी ऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया
આ બધું જાણીને મહાતેજસ્વી ઋષિપુત્ર ક્રોધથી દહકી ઊઠ્યો; બાલક હોવા છતાં વૃદ્ધ સમો તેજ ધરાવનાર તે ઋષિકુમારે તારા પિતાને શાપ આપ્યો.
Verse 9
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्टवा रोषादिदमुवाच ह । पितरं तेडभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव
તેણે તત્કાળ જળને સ્પર્શ કરીને (વિધિ મુજબ) ક્રોધમાં આ વચનો કહ્યાં. તારા પિતાને લક્ષ્ય કરીને તે તેજથી જાણે પ્રજ્વલિત થયો હોય તેમ દેખાતો હતો.
Verse 10
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् । त॑ नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति
જનમેજય બોલ્યો— “જે કોઈ નિર્દોષ હોવા છતાં મારા પૂજ્ય ગુરુ પર મરેલો સાપ નાખી ગયો છે, તે પાપીને ક્રોધિત નાગ તક્ષક પોતાના પ્રચંડ તેજથી ભસ્મ કરી દેશે.”
Verse 11
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदित: । सप्तरात्रादित: पापं पश्य मे तपसो बलम्
જનમેજય બોલ્યો— “તીક્ષ્ણ તેજવાળો એ વિષધર મારા વચનબળથી પ્રેરિત થઈ સાત રાતમાં જ તે પાપીને અહીં લઈ આવશે. જુઓ, મારી તપસ્યાનું બળ!”
Verse 12
शंंगी तेजसे प्रज्यलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताको लक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही--'जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दिया है, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक॒शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल” || ९-- ११ || इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सो5भवत् | दृष्टवा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत्,ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकर उसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी
એવું કહી તે બાળક ઝડપથી ત્યાં ગયો જ્યાં તેનો પિતા બેઠો હતો. પિતાને જોઈ તેણે રાજાને આપેલા શાપની વાત કહી—કે મારા વચનબળથી પ્રેરિત, ક્રોધિત અને પ્રચંડ તેજવાળો વિષધર તક્ષક નાગ સાત રાત પછી રાજાને વિષાગ્નિથી દહન કરી દેશે; અને તેણે પોતાની તપસ્યાનું બળ પણ દર્શાવ્યું.
Verse 13
स चापि मुनिशार्दूल: प्रेषषामास ते पितु: । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम्,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ
તે મునિશાર્દૂલ પણ તમારા પિતાની પાસે ‘ગૌરમુખ’ નામના પોતાના શિષ્યને મોકલ્યો—જે સુશીલ અને ગુણવાન હતો.
Verse 14
आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञ: सर्वमशेषत: । शप्तोडसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ
વિશ્રામ કર્યા પછી તેણે રાજાને બધું સંપૂર્ણ રીતે કહી સંભળાવ્યું અને મুনિનો સંદેશ આપ્યો—“હે ભૂપાલ! મારા પુત્રે તમને શાપ આપ્યો છે; તેથી સંયમિત અને સાવધાન રહો.”
Verse 15
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति । श्रुत्वा च तद् वचो घोरं पिता ते जनमेजय,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
“મહારાજ! તક્ષક નાગ પોતાના તેજથી તમને દહન કરી દેશે.” આ ભયંકર વચન સાંભળીને, જનમેજય, તમારા પિતા નાગશ્રેષ્ઠ તક્ષકથી અત્યંત ભયભીત થયા અને સતત સાવધાન રહ્યા. ત્યારબાદ સાતમો દિવસ આવી પહોંચ્યો ત્યારે, એ દિવસે બ્રહ્મર્ષિ કાશ્યપે રાજા પાસે જવાનો વિચાર કર્યો; માર્ગમાં એ જ સમયે નાગરાજ તક્ષકે કાશ્યપને જોઈ લીધો.
Verse 16
यत्तो5भवत् परित्रस्तस्तक्षकात् पन्नगोत्तमात् | ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
જનમેજય બોલ્યો—જ્યારે તે નાગશ્રેષ્ઠ તક્ષકથી ભયભીત થયો, ત્યારથી જ તે સતત સાવધાન રહ્યો. પછી સાતમો દિવસ આવી પહોંચ્યો—જે દિવસે તક્ષકના તેજથી દહન થઈ મૃત્યુ થશે એમ પૂર્વે કહેવાયું હતું—ત્યારે ઘટનાઓ નિયતિના અંત તરફ આગળ વધવા લાગી.
Verse 17
राज्ञ: समीप ब्रद्यर्षि: काश्यपो गन्तुमैच्छत । त॑ ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षक: काश्यपं तदा,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा
જનમેજય બોલ્યો—બ્રહ્મર્ષિ કાશ્યપ રાજાના સમીપ જવા ઇચ્છતા હતા. ત્યારે માર્ગમાં નાગેન્દ્ર તક્ષકે એ જ સમયે કાશ્યપને જોઈ લીધો. (આ વચ્ચે રાજા પરીક્ષિતે ઘોર ભવિષ્યવાણી સાંભળી સતત સાવધાન રહ્યા; સાતમા દિવસે કાશ્યપ રક્ષણાર્થે નીકળ્યા, પરંતુ તક્ષકે વચ્ચે જ તેમને અટકાવ્યા.)
Verse 18
तमब्रवीत् पन्नगेन्द्र: काश्यपं त्वरितं द्विजम् । क्व भवांस्त्वरितो याति कि च कार्य चिकीर्षति १८ ।। विप्रवर काश्यप बड़ी उतावलीसे पैर बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर नागराजने (ब्राह्मणका वेष धारण करके) इस प्रकार पूछा--'द्विजश्रेष्ठ आप कहाँ इतनी तीव्र गतिसे जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?”
ઉતાવળથી આગળ વધતા દ્વિજશ્રેષ્ઠ કાશ્યપને જોઈ નાગરાજ બોલ્યો—“તમે એટલી ઝડપથી ક્યાં જઈ રહ્યા છો? અને કયું કાર્ય કરવા ઇચ્છો છો?”
Verse 19
काश्यप उवाच यत्र राजा कुरुश्रेष्ठ: परिक्षिन्नाम वै द्विज । तक्षकेण भुजड़्ेन धक्ष्यते किल सोउद्य वै,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा
કાશ્યપ બોલ્યા—“હે બ્રાહ્મણ! હું ત્યાં જઈ રહ્યો છું જ્યાં કુરુશ્રેષ્ઠ રાજા પરીક્ષિત રહે છે. સાંભળ્યું છે કે આજે જ તક્ષક સર્પ તેને દંશે છે. તેથી તેને નિરોગ કરવા હું તાત્કાલિક ત્યાં દોડી જઈ રહ્યો છું; મારી રક્ષા હેઠળ રહેલા નૃપતિને તે સર્પ નષ્ટ કરી શકશે નહીં.”
Verse 20
गच्छाम्यहं तं त्वरित: सद्य: कर्तुमपज्वरम् । मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित् रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा
કાશ્યપે કહ્યું—“હું તત્કાળ, ઉતાવળે ત્યાં જઈને તેને વિષજ્વરથી તરત જ મુક્ત કરી દઈશ. અને તે મારા આશ્રયમાં આવી જાય પછી કોઈ સર્પ તેને પરાજિત કરી શકશે નહીં.”
Verse 21
तक्षक उवाच किमर्थ तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि । अहं स तक्षको ब्रह्मन् पश्य मे वीर्यमद्भुतम्,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया
તક્ષકે કહ્યું—“બ્રાહ્મણ! મેં દંશ કરેલા મનુષ્યને જીવિત કરવાની ઇચ્છા તમે શા માટે રાખો છો? હું જ તે તક્ષક છું—મારું અદ્ભુત પરાક્રમ જુઓ.”
Verse 22
न शक्तस्त्वं मया दष्ट॑ त॑ं संजीवयितुं नृपम् । इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोडदशद् वै वनस्पतिम्,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया
તક્ષકે કહ્યું—“મેં દંશ કરેલા તે રાજાને તમે જીવિત કરી શકતા નથી.” એમ કહી તક્ષકે ત્યાં જ એક વૃક્ષને દંશ કર્યો.
Verse 23
स दष्टमात्रो नागेन भस्मी भूतो 5 भवन्नग: । काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत त॑ नगम्,नागके डँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन! तदनन्तर काश्यपने (अपनी मन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत् जीवित (हरा-भरा) कर दिया
નાગે દંશ કરતાં જ તે વૃક્ષ બળી ને ભસ્મ થઈ ગયું. ત્યારબાદ, હે રાજન, કાશ્યપે મંત્રવિદ્યાના બળથી એ જ વૃક્ષને ફરી જીવંત કર્યું.
Verse 24
ततस्तं लोभयामास काम ब्रूहीति तक्षक: । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुन:,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --
પછી તક્ષકે તેને લલચાવવાનો પ્રયત્ન કર્યો અને કહ્યું—“બોલો, તમારી શું ઇચ્છા છે?” એમ કહેતાં કાશ્યપે તક્ષકને ફરી ઉત્તર આપ્યો.
Verse 25
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्व तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षक: श्लक्षणया गिरा,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --
કાશ્યપે કહ્યું—“હું ત્યાં ધનની ઇચ્છાથી જઈ રહ્યો છું.” તે સાંભળીને તક્ષકે મહાત્મા કાશ્યપને મૃદુ અને મીઠી વાણીથી લલચાવી કહ્યું—“તમારી જે ઇચ્છા હોય તે મારી પાસે માગો.”
Verse 26
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततो5धिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ,“अनघ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लो और लौट जाओ'
“અનઘ! રાજા પાસેથી જેટલું ધન તું ઇચ્છે છે, તેનાથી પણ વધુ મારી પાસેથી જ લઈ લે; મારી પાસેથી જ સ્વીકારી પાછો વળ.”
Verse 27
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वर: | लब्ध्वा वित्त निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम्,तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकर लौट गये
નાગે એમ કહ્યે પછી, મનુષ્યોમાં શ્રેષ્ઠ કાશ્યપે તક્ષક પાસેથી ઇચ્છિત જેટલું ધન મેળવી પાછા વળ્યા.
Verse 28
तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षक: । त॑ नृपं नृपतिश्रेष्ठ पितरं धार्मिक तव,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया
બ્રાહ્મણ પાછા વળ્યા પછી તક્ષકે છદ્મવેશ ધારણ કરીને તમારા ધર્માત્મા પિતા—ભૂપાલોમાં શ્રેષ્ઠ રાજા પરીક્ષિત—પાસે પહોંચી, કપટથી પોતાની વિષાગ્નિ વડે તેમને ભસ્મ કરી દીધા.
Verse 29
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवद्लिना । ततस्त्वं पुरुषव्याप्र विजयायाभिषेचित:,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया
“તે પ્રાસાદમાં રક્ષણ સાથે રહેતો હોવા છતાં, મેં તેને મારી વિષાગ્નિથી ભસ્મ કર્યો. ત્યારબાદ, પુરુષવ્યાઘ્ર! વિજય અને રાજ્યસ્થિરતા માટે તારો રાજપદે અભિષેક થયો.”
Verse 30
एतद् दृष्ट श्रुतं चापि यथावन्नपसत्तम । अस्माभिननिखिलं सर्व कथितं तेडतिदारुणम्,नृपश्रेष्ठ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निछ्ठर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसे हमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भी ठीक-ठीक सुना है
નૃપશ્રેષ્ઠ! આ પ્રસંગ અતિ કઠોર અને દુઃખદ છે; છતાં તું પૂછ્યું હોવાથી અમે કશું છુપાવ્યા વિના બધું યથાવત્ કહી દીધું—જે અમે પોતાની આંખે જોયું અને જે સાચું સાંભળ્યું, તે સર્વ।
Verse 31
श्र॒ुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्थ पराभवम् | अस्य चर्षेरुतंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम्,महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्का तिरस्कार किया है। इन महर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसा उचित समझो, करो
મહારાજ, નરશ્રેષ્ઠ! પૃથ્વી પર રહેલા સમયે તમારા પિતા રાજા પરીક્ષિતનું જે અપમાન થયું અને મહર્ષિ ઉતંકને જે રીતે પીડિત કરવામાં આવ્યો, તે બધું તમે સાંભળી લીધું. હવે આગળ જે યોગ્ય અને ધર્મસંગત હોય તે નક્કી કરીને તે પ્રમાણે કરો।
Verse 32
सौतिरु्वाच एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजय: । उवाच मन्त्रिण: सर्वानिदं वाक्यमरिन्दम:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनक! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजय अपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले
સૌતિ બોલ્યા—શૌનક! એ જ સમયે શત્રુદમન કરનાર રાજા જનમેજયે પોતાના સર્વ મંત્રીઓને આ રીતે કહ્યું।
Verse 33
जनमेजय उवाच अथ तत् कथितं केन यद् वृत्तं तद् वनस्पतौ | आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते
જનમેજયે કહ્યું—તક્ષકના દંશથી જે વૃક્ષ તે સમયે રાખનો ઢગલો બની ગયું હતું અને જેને કાશ્યપે ફરી જીવંત કરીને લીલુંછમ કર્યું—આ અદ્ભુત વૃત્તાંત તમને કોણે કહ્યું? કાશ્યપ સમયસર આવી પોતાના મંત્રોથી તક્ષકનું વિષ નષ્ટ કરી દેતા, તો નિશ્ચયે મારા પિતાનું મૃત્યુ ન થાત।
Verse 34
यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै | नूनं मन्त्रहतविषो न प्रणश्येत काश्यपात्,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते
જનમેજયે કહ્યું—તક્ષકના દંશથી જે વૃક્ષ રાખ બની ગયું હતું, તેને કાશ્યપે જીવંત કર્યું; તેથી કાશ્યપના મંત્રોથી તક્ષકનું વિષ નિશ્ચયે નષ્ટ થઈ શકતું. તેઓ સમયસર આવ્યા હોત તો મારા પિતાનો વિનાશ ન થાત।
Verse 35
चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधम: । दष्टं यदि मया विप्र: पार्थिवं जीवयिष्यति,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था
જનમેજયે કહ્યું—એ પાપાત્મા, નીચ સર્પ મનમાં વિચારવા લાગ્યો—“જો મારા દંશથી પડેલા રાજાને આ બ્રાહ્મણ જીવિત કરી દેશે, તો લોકો કહેશે કે તક્ષકનું વિષ પણ નિષ્ફળ થયું; ત્યારે તક્ષક લોકમાં હાસ્યનો પાત્ર બનશે.” એમ વિચારી, ધર્મ કરતાં માન-પ્રતિષ્ઠાને મોટું ગણીને, તેણે ધનથી બ્રાહ્મણને સંતોષ્યો.
Verse 36
तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् | विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुश्टिरद्धिजस्य वै,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था
જનમેજયે કહ્યું—“જો તક્ષકનું વિષ નિષ્ફળ ઠરે, તો તે લોકમાં હાસ્યનો પાત્ર બનશે.” એમ વિચારી, તેણે નિશ્ચયે ધનથી જ તે બ્રાહ્મણને સંતોષ્યો.
Verse 37
480 पक यस्य दास्यामि यातनाम् | एकं तु 4 तद् वृत्तं निर्जने वने,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा
જનમેજયે કહ્યું—આગળ હું પ્રયત્નપૂર્વક કોઈ ઉપાય કરીને તક્ષકને અવશ્ય દંડ આપીશ. પરંતુ એક વાત સાંભળવા ઈચ્છું છું—નિર્જન વનમાં તક્ષક અને કાશ્યપ બ્રાહ્મણનો જે સંવાદ થયો, તે કોણે જોયો-સાંભળ્યો? એ વર્તાંત તમારાં સુધી કેવી રીતે પહોંચ્યો? આ સાંભળીને જ હું સર્પનાશનો નિશ્ચય કરીશ.
Verse 38
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा | श्रुतवान् दृष्टवांश्वापि भवत्सु कथमागतम् | श्रुत्वा तस्य विधास्ये5हं पन्नगान्तकरीं मतिम्,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा
જનમેજયે કહ્યું—તે સમયે નાગેન્દ્ર તક્ષક અને કાશ્યપ બ્રાહ્મણનો સંવાદ કોણે સાંભળ્યો કે જોયો? અને એ વર્તાંત તમારાં સુધી કેવી રીતે આવ્યો? તે સાંભળીને હું અહીં સર્પોના અંતનો નિશ્ચય કરીશ.
Verse 39
मन्त्रिण ऊचु. शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि,मन्त्री बोले--राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था
મંત્રીઓએ કહ્યું—રાજન! સાંભળો; અગાઉ જેમણે અમને જે રીતે કહ્યું હતું, તે પ્રમાણે કહીએ છીએ—માર્ગમાં દ્વિજશ્રેષ્ઠ કાશ્યપ અને નાગેન્દ્ર તક્ષકનો સામનો થયો હતો.
Verse 40
तस्मिन् वृक्षे नर: कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन् पूर्वमारूढ: शुष्कशाखां वनस्पतौ,मन्त्री बोले--राजन्! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था
હે રાજન! તે વૃક્ષ પર એક માણસ પહેલેથી જ ચઢી, ઇંધણ માટે સૂકી ડાળીઓ શોધતો હતો।
Verse 41
न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्वधिजौ । सह तेनैव वृक्षेण भस्मी भूतो5 भवन्नूप,तक्षक नाग और ब्राह्मण--दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्य भी है। राजन्! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गया था
હે રાજન! તક્ષક નાગ અને સર્પવધ માટે ઉદ્યત બ્રાહ્મણ—બન્નેને જ ખબર ન પડી કે તે વૃક્ષ પર બીજો માણસ પણ બેઠો છે. તક્ષકે દંશ કરતાં જ તે માણસ પણ એ જ વૃક્ષ સાથે બળી ભસ્મ થઈ ગયો।
Verse 42
द्विजप्रभावादू राजेन्द्र व्यजीवत् सवनस्पति: । तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम्,परंतु राजेन्द्र! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्रेष्ठ! उसी मनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी
હે રાજેન્દ્ર! તે બ્રાહ્મણના પ્રભાવથી તે વૃક્ષ પણ ફરી જીવંત થયું. પછી તે નરશ્રેષ્ઠ આવીને તક્ષક અને બ્રાહ્મણની સમગ્ર ઘટના અમને કહી સંભળાવી।
Verse 43
यथावृत्त॑ तु तत् सर्व तक्षकस्य द्विजस्थ च । एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्,राजन! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो
હે રાજન! તક્ષક અને બ્રાહ્મણ વિષે જે કંઈ જેમ બન્યું, તે બધું અમે જેમ જોયું અને સાંભળ્યું તેમ તને કહી સંભળાવ્યું. હે નૃપશાર્દૂલ! આ સાંભળી હવે આગળ જે યોગ્ય લાગે તે કર।
Verse 44
सौतिर्वाच मन्त्रिणां तु वच: श्रुव्वा स राजा जनमेजय: । पर्यतप्यत दुःखार्त: प्रत्यपिंषघत् करं करे,उग्रश्रवाजी कहते हैं--मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर हो संतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे
સૌતિ બોલ્યા—મંત્રીઓના વચન સાંભળી રાજા જનમેજય દુઃખથી વ્યાકુળ થઈ અત્યંત સંતપ્ત થયો; અને ક્રોધથી ઉદ્ગ્ર બની હાથથી હાથ મલવા લાગ્યો।
Verse 45
निः:श्वासमुष्णमसकृद् दीर्घ राजीवलोचन: । मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन् नृप:,वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजा जनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगे
કમળનેત્ર રાજા વારંવાર લાંબા અને ગરમ નિશ્વાસ છોડવા લાગ્યા. પછી શોકથી વ્યાકુળ થઈ બંને આંખોમાંથી આંસુ વહાવી ઊંચે સ્વરે રડવા લાગ્યા.
Verse 46
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वित: । दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्टवा चापो यथाविधि,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--
ત્યારે દુઃખ-શોકથી ભરાયેલા મહીપાલે અણથંભ આંસુ વહાવતાં, વિધિ મુજબ જળનો સ્પર્શ કરીને બોલવાનું આરંભ્યું.
Verse 47
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृप: । अमर्षी मन्त्रिण: सर्वानिदं वचनमब्रवीत्,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--
રાજાએ ક્ષણમાત્ર ધ્યાન કરીને મનમાં નિશ્ચય પક્કો કર્યો. પછી અમર્ષથી દગ્ધ થઈ તેણે સર્વ મંત્રીઓને આ વચન કહ્યાં.
Verse 48
जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत । अनन्तरं च मन्ये5हं तक्षकाय दुरात्मने,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है
જનમેજયે કહ્યું—“મંત્રિઓ! મારા પિતાના સ્વર્ગગમન વિષે તમારું વચન સાંભળી મેં જે કર્તવ્ય નક્કી કર્યું છે, તે સાંભળો. મારું માનવું છે કે તે દુરાત્મા તક્ષક સામે તરત પ્રતિશોધ લેવો જોઈએ.”
Verse 49
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसित: पिता । शज्धिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है
“જેણે મારા પિતાને હાનિ પહોંચાડી છે, તેના વિરુદ્ધ પ્રતિકાર અવશ્ય કરવો જોઈએ—શૃંગી ઋષિને માત્ર નિમિત્ત બનાવી તેણે સ્વયં તે પાર્થિવને દગ્ધ કરીને મારી નાખ્યો.”
Verse 50
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् । यदा55गच्छेत् स वै विप्रो ननु जीवेत् पिता मम,उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवता आ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पज्चाशत्तमोडध्याय:
જનમેજયે કહ્યું—તેની સૌથી મોટી દુષ્ટતા એ છે કે તેણે કાશ્યપને પાછા ફેરવી દીધા. જો તે બ્રાહ્મણદેવ આવી પહોંચ્યા હોત, તો મારા પિતા નિશ્ચિત જ જીવિત રહેતા.
Verse 51
परिहीयेत कि तस्य यदि जीवेत् स पार्थिव: । काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च,यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमें उस दुष्टकी क्या हानि हो जाती?
જનમેજયે કહ્યું—કાશ્યપના પ્રસાદ અને મંત્રીઓના વિનયથી જો રાજા જીવિત રહી શકતા, તો એ દુષ્ટને શું નુકસાન થાત?
Verse 52
स तु वारितवान् मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् | संजिजीवयिषुं प्राप्त राजानमपराजितम्,जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया
ક્યાંય પરાજિત ન થનાર એવા મારા પિતા રાજા પરીક્ષિતને જીવિત કરવા દ્વિજશ્રેષ્ઠ કાશ્યપ આવી પહોંચ્યા હતા; પરંતુ તક્ષકે મોહવશ તેમને અટકાવ્યા.
Verse 53
महानतिक्रमो होष तक्षकस्य दुरात्मन: । द्विजस्य योडददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति,दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें
જનમેજયે કહ્યું—દુરાત્મા તક્ષકનો આ મહા અપરાધ છે કે તેણે બ્રાહ્મણને ધન આપ્યું, ‘રાજાને જીવિત ન કર’ એવા આશયથી.
Verse 54
उत्तड़कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्न महत् प्रियम् । भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितु:,इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये पिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा
અતએવ મહર્ષિ ઉત્તંકને પ્રિય કરવા, પોતાનું પરમ હિત સાધવા અને આપ સૌને પણ પ્રસન્ન કરવા—હું પિતાપ્રત્યેનું કર્તવ્ય નિભાવવા જઈ રહ્યો છું; પિતાના વૈરનો બદલો લઈશ.
Rather than an explicit dilemma, the chapter frames an ethical pressure point: how royal power expressed through ritual should be bounded by auspicious intent, learned oversight, and public legitimacy—preparing the setting for consequential decisions.
The chapter models how speech and precedent regulate authority: praise is not merely decorative but a normative tool that aligns kingship with dharma through ritual correctness, qualified expertise, and welfare-oriented intentions.
No explicit phalaśruti is stated; the closest meta-commentary is the narrative note that all parties (king, priests, and fire) become pleased, signaling that correct ritual speech and procedure are treated as efficacious and socially stabilizing.