Bala KandaPrakarana 3020 Verses

Prakarana 30

Sopāna-1: ‘Ārambha-śuddhi’—the first stair where the heart is softened by śravaṇa (hearing) and maṅgal (auspicious joy). In Bālakāṇḍa, devotion is born as rasa: wonder, tenderness, and dharma-affirming delight. The present unit (Doha 290–299 region) is a threshold-moment: the household-city (Ayodhyā) becomes a liturgical body preparing for the divine marriage, turning social celebration into a sacrament of bhakti.

Bālakāṇḍa établit le Manas comme un sopāna (une échelle) en transmuant la causalité épique en causalité de bhakti : les événements adviennent parce que l’amour mûrit. Dans cet extrait, le rasa est surtout harsa (la joie), tressé de vātsalya et de sakhya : les larmes de Daśaratha, le frisson des frères, l’ornementation collective de la cité. Le récit n’est pas seulement une « nouvelle du svayaṃvara de Sītā » ; c’est la sanctification de la vie civique d’Ayodhyā en une préparation semblable à un yajña. La théologie de Tulasīdāsa encadre discrètement Rāma et Lakṣmaṇa comme « biswa-bibhūṣaṇa » — des ornements cosmiques — de sorte que la fête humaine devient reconnaissance du Divin. L’alternance du mètre (le flux de la chaupāī, l’ancrage du doha) mime l’ascension spirituelle : l’émotion monte par vagues, puis se stabilise dans des distiques aphoristiques. Ainsi, la place de ce kāṇḍa est fondatrice : elle enseigne que la libération commence comme écoute commune, interrogation affectueuse, et disponibilité dharmique pour la līlā du Seigneur.

Verses

Verse 602 (चौपाई)

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।। भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।। करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।। बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती।। रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।। पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।। खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।। पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।

Verse 603 (दोहा/सोरठा)

कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।290।।

Verse 604 (चौपाई)

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।। प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी।। तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।। भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे।। स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।। पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।। जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई।। कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने।।

Verse 605 (दोहा/सोरठा)

सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ। रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ।।291।।

Verse 606 (चौपाई)

पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे।। जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।। तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे।। सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका।। संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा।। तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।। सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू।। जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा।।

Verse 607 (दोहा/सोरठा)

तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल। भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।292।।

Verse 608 (चौपाई)

सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।। देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा।। राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।। कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।। देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ।। दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।। सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।। कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना।।

Verse 609 (दोहा/सोरठा)

तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ। कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।293।।

Verse 610 (चौपाई)

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।। जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।। तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।। सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं।। तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।। बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी।। तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।।

Verse 611 (दोहा/सोरठा)

चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ। भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।

Verse 612 (चौपाई)

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।। सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।। प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी।। मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।। लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।। राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।। मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।। दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।

Verse 613 (दोहा/सोरठा)

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।

Verse 614 (चौपाई)

कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।। समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने बधाए।। भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।। सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।। जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि।। तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।। ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू।। कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला।।

Verse 615 (दोहा/सोरठा)

मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ। बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ।।296।।

Verse 616 (चौपाई)

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।। बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि।। गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं।। भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।। मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।। कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।। गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता।। बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा।।

Verse 617 (दोहा/सोरठा)

सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार। जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।297।।

Verse 618 (चौपाई)

भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।। चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।। भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।। रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।। सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।। नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।। तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।। सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।

Verse 619 (दोहा/सोरठा)

छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन। जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।298।।

Verse 620 (चौपाई)

बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।। फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना।। रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।। चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं।। सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते।। सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।। जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।। अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।

Verse 621 (दोहा/सोरठा)

चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात। होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात।।299।।

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