सोपान-प्रवेश: ‘श्रद्धा-जननी बाल-लीला’ से साधक का चित्त शुद्ध होता है। बालकाण्ड में भक्ति का बीज (नाम, रूप, गुण, लीला) हृदय-भूमि में पड़ता है—अहंकार के ‘धनुष’ का भंजन और गुरु-कृपा की स्थापना इस सीढ़ी का मूल संकेत है। प्रस्तुत अंश में परशुराम का क्रोध, राम की विनय-नीति, और अंततः परशुराम का आत्मसमर्पण—साधक के भीतर ‘रज-तम’ से ‘सत्त्व’ की ओर चढ़ाई का रूपक बनते हैं।
El rasa dominante de este episodio es la conjunción de vīra y śānta, con destellos de hāsya y karuṇā. El ímpetu feroz de Paraśurāma se expresa en lenguaje védico-yajñico: hacha, yajña, ofrenda, leña ritual, e imágenes como “el fuego-ascua de la cólera” dan al enojo un velo de dharma. En contraste, la palabra de Rāma es una corriente pura de vinaya-rasa: llamándose a sí mismo “de nombre pequeño”, reconociendo la dignidad del brāhmaṇa, y sin embargo manifestando el verdadero pratāpa sin ira. Ésta es la tesis de Tulsī: el Señor, en forma saguṇa, es sumamente humilde, pero invencible como el tattva del Brahman nirguṇa. En el desenlace, el amor estremecido de Paraśurāma y su clamor de victoria señalan, dentro del sādhaka, el apaciguamiento del “arma del yo”: la ira (rajas) se derrite en la humildad (sattva) y se vuelve bhakti (prema). Es una etapa decisiva del sopān del Bālakāṇḍa: reconocer el poder del guru y el poder de Dios.
Verse 582 (चौपाई)
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।। भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।। आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।। बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।। जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।। देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।। बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।। बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।
Verse 583 (दोहा/सोरठा)
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु। संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।
Verse 584 (चौपाई)
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।। करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।। छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।। भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ।। गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।। टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू।। राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।। जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।
Verse 585 (दोहा/सोरठा)
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।
Verse 586 (चौपाई)
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।। नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा।। जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।। छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।। हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।। राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।। देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।। सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।
Verse 587 (दोहा/सोरठा)
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम। बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।282।।
Verse 588 (चौपाई)
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।। चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु।। समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।। मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।। मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।। भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।। राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।। छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना।।
Verse 589 (दोहा/सोरठा)
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ। तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।
Verse 590 (चौपाई)
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।। जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।। छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।। कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।। बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।। सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।। राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।। देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।
Verse 591 (दोहा/सोरठा)
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात।।284।।
Verse 592 (चौपाई)
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।। जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।। बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।। सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।। करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।। अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।। कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।। अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने।।
Verse 593 (दोहा/सोरठा)
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल। हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।
Verse 594 (चौपाई)
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।। जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी।। सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई।। गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी।। जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।। मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई।। कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।। टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु।।
Verse 595 (दोहा/सोरठा)
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु। बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु।।286।।
Verse 596 (चौपाई)
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।। मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला।। बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।। हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा।। हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए।। रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।। पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।। बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।
Verse 597 (दोहा/सोरठा)
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।287।।
Verse 598 (चौपाई)
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।। कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई।। तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए।। मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।। किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा।। सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी।। चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई।।
Verse 599 (दोहा/सोरठा)
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।। हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि।।288।।
Verse 600 (चौपाई)
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।। मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए।। दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।। जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही।। दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।। जनक भवन कै सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।। जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी।। जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा।।
Verse 601 (दोहा/सोरठा)
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।। तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु।।289।।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free Google sign-in keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.