सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’—चित्त का संस्कार, दृष्टि का शुद्धीकरण, और रूप-माधुर्य के द्वारा सगुण ब्रह्म में मन का स्थिरीकरण। इस काण्ड में कथा-श्रवण स्वयं साधना बनता है: बाल-लीला और मिथिला-लीला ‘आकर्षण’ नहीं, मन को राम-नाम/राम-रूप में टिकाने का आध्यात्मिक प्रशिक्षण है।
El rasa principal del Bālakāṇḍa es el “śṛṅgāra-bhakti” y lo adbhuta, que Tulasī equilibra con maryādā (recta norma) y con el despertar del vairāgya. En este tramo, el primer mutuo darśana de Rāma y Sītā no es mera descripción de belleza mundana, sino un yoga de concentración del citta: la mente de Rāma “medita en el corazón”, la mirada de Sītā queda “asombrada” y fija, y la cadena de símiles (luna, loto, abeja, chākora) se vuelve metáfora de la psicología interior. A la vez, el pūjā a Gaurī y la bendición muestran que la līlā acontece dentro del orden del dharma: no es kāma, sino el decreto de la “vía propicia” (anukūla vidhi). Este kāṇḍa ocupa el primer lugar en el sopāna porque aquí los sentidos del sādhaka (vista/oído) se purifican y hallan rasa en “forma y Nombre” (rūpa-nāma); eso prepara el corazón para el renunciamiento, la ida al bosque y el dharma de la guerra que vendrán.
Verse 480 (चौपाई)
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।। मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।।मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही।। अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।। भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।। देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।। जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।। सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।। सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।।
Verse 481 (दोहा/सोरठा)
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि। बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।
Verse 482 (चौपाई)
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।। पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई।। जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।। सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।। रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।। मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।। जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।। मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
Verse 483 (दोहा/सोरठा)
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान। मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान।।231।।
Verse 484 (चौपाई)
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।। जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी।। लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।। देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।। थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।। अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।। लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।। जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।
Verse 485 (दोहा/सोरठा)
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ। निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ।।232।।
Verse 486 (चौपाई)
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।। मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के।। भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए।। बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।। चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला।। मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं।। उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा।। सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना।।
Verse 487 (दोहा/सोरठा)
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान। देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।233।।
Verse 488 (चौपाई)
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।। बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।। सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।। नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।। परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहि सभीता।। पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।। गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।। धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने।।
Verse 489 (दोहा/सोरठा)
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।। 234।।
Verse 490 (चौपाई)
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।। प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।। परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही।। गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी।। जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।। जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।
Verse 491 (दोहा/सोरठा)
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।।
Verse 492 (चौपाई)
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।
Verse 493 (छंद)
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।।
Verse 494 (दोहा/सोरठा)
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।।236।।
Verse 495 (चौपाई)
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।। राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।। सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।। सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।। करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।। बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।। प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा।। बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।
Verse 496 (दोहा/सोरठा)
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।।237।।
Verse 497 (चौपाई)
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।। कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।। बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।। सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।। करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।। बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।। उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।। बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।
Verse 498 (दोहा/सोरठा)
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।
Verse 499 (चौपाई)
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।। कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।। ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।। उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।। रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।। तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।। बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।। नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।। सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।। जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।
Verse 500 (दोहा/सोरठा)
सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ।।239।।
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