पितृयज्ञे नारायणतत्त्वम् — The Nārāyaṇa Grounding of Ancestral Offerings
यथाशक्ति यथान्यायं पूजां वै चक्रिरे तदा । पुष्पवषैश्न दिव्यैस्तमवचक्रुर्दिवौकस:,उन्हें निर्भय होकर शान्त और एकाग्रचित्तसे ऊपर जाते समय समस्त चराचर प्राणियोंने देखा और अपनी शक्ति तथा रीतिके अनुसार उनका यथोचित पूजन किया। देवताओं ने उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा की
Entonces le rindieron culto según su fuerza y conforme al rito debido; y los moradores del cielo, los dioses, lo cubrieron con una lluvia de flores divinas.
शुक उवाच