कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- इस प्रकार समबुद्धिरूप कर्मगोगका और उसके फलका महत्त्व बतलाकर अब दो श्लोकोर्ें भगवान् कर्मयोगका स्वरूप बतलाते हुए अर्जुनको कर्मयोगर्ें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहते हैं-- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड्रो5स्त्वकर्मणि,तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है,* उसके फलोंमें कभी नहीं*। इसलिये तू कर्मोके फलका हेतु मत हो” तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो
sañjaya uvāca — karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||
Dijo Sañjaya: Tu derecho es sólo a la acción, nunca en momento alguno a sus frutos. No hagas de los frutos de la acción tu motivo, ni permitas que tu apego se incline hacia la inacción.
संजय उवाच