Ādi-parva Adhyāya 116 — Pāṇḍu’s Transgression of the Curse and Mādrī’s Final Charge
गुरवस्तोषिता वापि तथास्तु दुहिता मम । एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायन: स्वयम्,कहते हैं, स्त्रियोंका दामादमें पुत्रसे भी अधिक स्नेह होता है। यदि मुझे भी सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक पुत्री प्राप्त हो जाय तो मैं पुत्र और दौहित्र दोनोंसे घिरी रहकर कृतकृत्य हो जाऊँ। यदि मैंने सचमुच तप, दान अथवा होम किया हो तथा गुरुजनोंको सेवाद्वारा प्रसन्न कर लिया हो, तो मुझे पुत्री अवश्य प्राप्त हो। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डके विभाग कर दिये और पूरे सौ अंशोंकी गणना करके गान्धारीसे कहा
guravas toṣitā vāpi tathāstu duhitā mama | etasminn eva kāle tu kṛṣṇadvaipāyanaḥ svayam ||
Dijo Vaiśampāyana: «Si los mayores y los maestros han quedado verdaderamente complacidos, que así sea: que yo tenga una hija.» Y en ese mismo instante, Kṛṣṇa Dvaipāyana (Vyāsa) intervino por sí mismo.
वैशम्पायन उवाच