सोपान-प्रवेश: ‘मंगल’ और ‘सगुन’ के द्वारा चित्त-शुद्धि। बालकाण्ड में भक्त-हृदय राम-लीला के सौंदर्य (माधुर्य) से आकृष्ट होकर श्रद्धा-पथ पर चढ़ता है; यहाँ बाह्य उत्सव (बरात, बाजा, साज) अंतःकरण के भीतर ‘सुमंगल’ बनकर विवेक-जागरण और ईश्वर-प्रसाद-बोध का द्वार खोलता है।
In this segmented passage (Doha 300–309), there is an expansive portrayal of the wedding-procession’s departure and the city’s festival; yet its rasa is not merely śṛṅgāra or joy—it is maṅgala-rasa, which stabilises the saṃskāra of devotion. Elephant-bells, banners, chariot-roar, kettledrums, shehnāī—these outer sounds prepare the inner anāhata: the mind gathers into concentration, and the communal spirit (in the form of satsanga) grows strong. Here Tulasī teaches the prosperity of folk-life as “Īśvara-prasāda.” Auspicious omens (birds, animals, the threefold breeze, curd and fish, and other saguṇa-lakṣaṇas) indicate that even the order of the world moves under Rāma’s grace. Thus this stair of the Bālakāṇḍa leads the seeker from “delight” to “refuge”: the source of delight is līlā, and the refuge is Rāma’s Name and Rāma’s Form.
Verse 622 (चौपाई)
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।। चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।। बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।। तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।। मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।। बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।। कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।। चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई।।
Verse 623 (दोहा/सोरठा)
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर।।300।।
Verse 624 (चौपाई)
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।। निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।। महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिंएँ आरती मंगल थारी।। गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।। तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।। दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।। राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।
Verse 625 (दोहा/सोरठा)
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु। आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।
Verse 626 (चौपाई)
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।। करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ।। सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।। हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।। भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे।। सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।। घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।। करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना ।
Verse 627 (दोहा/सोरठा)
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।। नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।302।।
Verse 628 (चौपाई)
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।। चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।। दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।। सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी।। लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।। मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।। छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।। सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।
Verse 629 (दोहा/सोरठा)
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार। जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।303।।
Verse 630 (चौपाई)
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।। राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।। सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।। एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।। आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।। बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।। असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।। नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।
Verse 631 (दोहा/सोरठा)
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान। सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।304।।
Verse 632 (चौपाई)
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।। भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।। फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।। भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।। मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।। दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।। अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता।। देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।
Verse 633 (दोहा/सोरठा)
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
Verse 634 (चौपाई)
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।। बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें।। प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।। करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई।। बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं।। अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।। जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।। हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई।।
Verse 635 (दोहा/सोरठा)
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास। लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।306।।
Verse 636 (चौपाई)
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।। बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।। सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।। पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।। सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।। बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।। हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।। चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।
Verse 637 (दोहा/सोरठा)
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत। उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
Verse 638 (चौपाई)
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।। कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।। पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।। सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।। पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।। बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं।। भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा।। हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता।।
Verse 639 (दोहा/सोरठा)
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत। मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।308।।
Verse 640 (चौपाई)
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।। नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।। सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।। सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना।। सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।। सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।। प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।। ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।
Verse 641 (दोहा/सोरठा)
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज। जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।।309।।
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