शत्रोरपि गुणा ग्राह्मा दोषा वाच्या गुरोरपि । सर्वथा सर्वयत्नेन पुत्रे शिष्ये हितं वदेत्,शत्रुके भी गुण ग्रहण करने चाहिये और गुरुके भी दोष बतानेमें संकोच नहीं करना चाहिये। गुरुको सब प्रकारसे पूर्ण प्रयत्न करके पुत्र और शिष्यके लिये जो हितकर हो, वही बात कहनी चाहिये
“Even an enemy’s virtues should be acknowledged, and even a teacher’s faults should be spoken of. In every way, with every effort, a teacher should say only what is for the good of his son and his disciple.”
भीष्म उवाच