अगस्त्यस्य वित्तयाचनं तथा इल्वलोपभिक्षणनिर्णयः
Agastya’s request for wealth and the decision to seek resources from Ilvala
तदाप्रभृति राजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महासुर: । मन्युमान् भ्रातरं छागं मायावी हाकरोत् ततः,एक दिन दितिनन्दन इल्वलने एक तपस्वी ब्राह्मणसे कहा--“भगवन्! आप मुझे ऐसा पुत्र दें, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हो।' उन ब्राह्मणदेवताने इल्चलको इन्द्रके समान पुत्र नहीं दिया। इससे वह असुर उन ब्राह्मणदेवतापर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभीसे इल्वल दैत्य क्रोधमें भरकर ब्राह्मणोंकी हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको मायासे बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ था! अतः वह क्षणभरमें भेड़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरेको पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मणको खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मणको मारनेकी इच्छा करता था
tadāprabhṛti rājendra ilvalo brahmahāsuraḥ | manyumān bhrātaraṃ chāgaṃ māyāvī hākarot tataḥ ||
From that time onward, O best of kings, Ilvala—an Asura stained by the sin of slaying Brahmins—became filled with wrath. Then by illusion he would turn Vātāpi into a goat; Ilvala would cook that flesh and feed it to an unsuspecting Brahmin, intending thereby to bring about the Brahmin’s death.
लोगश उवाच