Brahmaṇānāṃ Yācanā—Tīrtha-yātrā-prastāvaḥ
The Brahmanas’ Petition and the Proposal of Pilgrimage
“बड़े-बड़े संग्रामोंमें उसकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। वह महान् युद्धविशारद, महाधनुर्धर, अस्त्र-शस्त्रोंका महान ज्ञाता, श्रेष्ठ, सुन्दर महेश्वरपुत्र कार्तिकेयके समान पराक्रमी, सूर्यदेवताका पुत्र और शक्तिशाली वीर है। इसी प्रकार मैं अर्जुनको भी जानता हूँ। वह कार्तिकेयसे भी बढ़कर है, उसमें स्वभावसे ही दुःसह पुरुषार्थ भरा हुआ है। युद्धमें कर्ण अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। शत्रुदमन! तुम्हारे मनमें जिस बातको लेकर कर्णसे भय बना रहता है, मैं अर्जुनके लौटनेपर तुम्हारे उस भयको भी दूर कर दूँगा। वीरवर! तीर्थयात्राके विषयमें जो तुम्हारा मानसिक संकल्प है, उसके विषयमें महर्षि लोमश निश्चय ही तुमसे सब कुछ बतावेंगे ।। यच्च किंचित् तपोयुक्त फल॑ तीर्थेषु भारत । ब्रद्मर्षिरिष ब्रूयात् ते तच्छुद्धेयं न चान्यथा,“भरतनन्दन! तीर्थोंमें जो कुछ तपस्यायुक्त फल प्राप्त होता है, वह सब ये ब्रह्मर्षि लोमश तुम्हें बतायेंगे, तुम्हें उसपर विश्वास करना चाहिये। उसमें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये”
yacca kiñcit tapoyukta-phalaṁ tīrtheṣu bhārata | brahmarṣir eṣa brūyāt te tac chraddheyaṁ na cānyathā ||
O Bhārata, whatever merit is gained at the sacred fords through austerity—this Brahmarṣi, Lomāśa, will explain it all to you. You should place trust in his account and not entertain any contrary doubt about it.
वैशम्पायन उवाच