निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते । सूच्येवाञ्जनचूर्णस्य किमिति प्रतिपालयेत्,किंतु कुन्तीकुमार! सलाईसे थोड़ा-थोड़ा करके उठाये जानेवाले अंजनचूर्ण (सुरमे)-की भाँति एक-एक निमेषमें जिसकी आयु क्षीण हो रही है, वह क्षणभंगुर मानव समयकी प्रतीक्षा क्या कर सकता है?
O son of Kuntī, a man’s life ebbs away even in a single blink—like collyrium powder lifted little by little on a needle’s point. How can one so fleeting wait upon time?
भीमसेन उवाच