रामस्य पम्पातीरगमनम्, सुग्रीवसख्यं, वालिवधः, सीतारक्षणवृत्तान्तश्च
Rāma at Pampā; alliance with Sugrīva; Vālin’s fall; Sītā’s guarded captivity
सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणा: । क्रुद्धास्ते निर्दहियुर्वे तूलराशिमिवानल: । तत एतानपृष्टवैव शिष्या: शीघ्रं पलायत,दुर्वासा बोले--वास्तवमें व्यर्थ ही रसोई बनवाकर हमने राजर्षि युधिष्ठिरका महान् अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव क्रूर दृष्टिसे देखकर हमें भस्म कर दें। ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् राजा अम्बरीषके प्रभावको याद करके मैं उन भक्तजनोंसे सदा डरता रहता हूँ, जिन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले रखा है। सब पाण्डव महामना, धर्मपरायण, विद्वान, शूरवीर, व्रतधारी तथा तपस्वी हैं। वे सदा सदाचारपरायण तथा भगवान् वासुदेवको अपना परम आश्रय माननेवाले हैं। पाण्डव कुपित होनेपर हमको उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग। अतः शिष्यो! पाण्डवोंसे बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो
sadācāraratā nityaṁ vāsudevaparāyaṇāḥ | kruddhās te nirdahiyur ve tūlarāśim ivānalaḥ | tata etān apṛṣṭvaiva śiṣyāḥ śīghraṁ palāyata |
Durvāsā said: “They are ever devoted to right conduct and always take Vāsudeva as their highest refuge. If they become enraged, they could burn us to ashes—like fire consuming a heap of cotton. Therefore, disciples, without even asking them, flee at once.”
दुर्वाया उवाच