ब्राह्मणानुयात्रा—शौनकोपदेशः
Brāhmaṇas Follow into Exile and Śaunaka’s Instruction
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पुरवासियोंके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ,हि मय >> () है 2 द्वितीयो&्ध्याय: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत वैशम्पायन उवाच प्रभातायां तु शर्वर्या तेषामक्लिष्टकर्मणाम् | वन॑ यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजो5ग्रत: वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! जब रात बीती और प्रभातका उदय हुआ तथा अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डव वनकी ओर जानेके लिये उद्यत हुए, उस समय भिक्षान्नभोजी ब्राह्मण साथ चलनेके लिये उनके सामने खड़े हो गये
vaiśampāyana uvāca | prabhātāyāṃ tu śarvaryā teṣām akliṣṭa-karmāṇām | vanaṃ yiyāsatāṃ viprās tasthur bhikṣā-bhujo 'grataḥ ||
Vaiśampāyana said: When the night had passed and dawn had arisen, as the Pāṇḍavas—men of effortless prowess—prepared to depart for the forest, brāhmaṇas who lived on alms stood before them, ready to accompany them.
वैशम्पायन उवाच