भवत्येव हि मे बुद्धिर्दष्टवा55त्मानं सुखाच्च्युतम् धारीराष्टरं श्र दुर्वत्तानृध्यतः प्रेक्ष्य सर्वश:,“ब्रह्म! जब मैं अपनेको सुखसे वज्चित पाता हूँ और दुराचारी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सब प्रकारसे समृद्धिशाली होते देखता हूँ, तब स्वभावतः ही मेरे मनमें एक विचार उठता है
“O Brahmā! When I see myself fallen away from happiness, and behold the sons of Dhṛtarāṣṭra—wicked in conduct—prospering in every way, a thought naturally rises within my mind.”
वैशम्पायन उवाच