इस प्रकार श्रीमह्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें दग्भोड्भावका कथाविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९६ ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५३ “लोक हैं।] प्यास बछ। अि<-छऋाझ जा - जिस अस्त्रसे अभिभूत होकर योद्धा रथ और हाथी आदिके ककुद् (पृष्ठभाग)-पर ही सोते रह जाते हैं, उसका नाम काकुदीक एवं प्रस्वापन है। जैसे शुक पानीके ऊपर रखी हुई बाँसकी नलिकाको पकड़कर भयसे चिल्लाता रहता है, उसी प्रकार जिससे मोहित हुए योद्धा बिना भयके ही भय देखकर घोड़े और रथ आदिके पाँवोंसे चिपट जाते हैं; उस अस्त्रका नाम शुक अथवा मोहन है। जिस अस्त्रसे भ्रान्तचित्त होकर मनुष्यको नाक (स्वर्ग)-लोक दिखायी देने लगे, वह नाक या उन््मादन कहलाता है। जिसके प्रहारसे विद्ध होकर लोग त्रासके कारण मल-मूत्र करने लगते हैं, वह अक्षिसंतर्जन अथवा त्रासन नामक अस्त्र है। संतान अथवा दैवत अस्त्र वह है, जिसके प्रयोगसे अविच्छिन्नरूपसे अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा होने लगती है। जिसके प्रयोगसे मनुष्य वेदनाके मारे नाच उठता है, वह नर्तक या पैशाच अस्त्र है। भयानक संहारकारी अस्त्रको घोर अथवा राक्षस कहा गया है। जिससे आहत होकर लोग मुँहमें पत्थर रखकर मरनेके लिये निकल पड़ते हैं, वह आस्यमोदक अथवा याम्य नामक अस्त्र है। (भारतभावदीपटीका) सप्तनवतितमो< ध्याय: कण्व मुनिका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए मातलिका उपाख्यान आरम्भ करना वैशम्पायन उवाच जामदग्न्यवच: श्रुत्वा कण्वोडपि भगवानृषि: । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत् कुरुसंसदि,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जमदग्निनन्दन परशुरामका यह वचन सुनकर भगवान् कण्व मुनिने भी कौरवसभामें दुर्योधनसे यह बात कही
vaiśampāyana uvāca | jāmadagnyavacaḥ śrutvā kaṇvo 'pi bhagavān ṛṣiḥ | duryodhanam idaṃ vākyam abravīt kurusaṃsadi ||
Vaiśampāyana said: “O Janamejaya, having heard the words of Jāmadagnya (Paraśurāma), the venerable sage Kaṇva too addressed Duryodhana in the assembly of the Kurus.”
राम उवाच
The verse frames a shift from martial display to ethical-political counsel: after hearing Paraśurāma, the sage Kaṇva speaks in the royal court, implying that dharma in governance includes listening to wise counsel and pursuing reconciliation to prevent catastrophic war.
Vaiśampāyana narrates to King Janamejaya that, in the Kuru assembly, the sage Kaṇva—having heard Paraśurāma’s words—now addresses Duryodhana, initiating a new segment of advice aimed at settlement/peace.