सेनापति-निर्णयः तथा पाण्डवसेनायाः कुरुक्षेत्रगमनम्
Decision on Command and the Pandavas’ March to Kurukshetra
द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन््दां कृत्वा तथा पुनः । भेदयित्वा नृपान् सर्वान् वाम्भिर्मन्त्रेण चासकृत्,समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात् फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय
dyūtato dhārtarāṣṭrāṇāṁ nindāṁ kṛtvā tathā punaḥ | bhedayitvā nṛpān sarvān vāgbhir mantreṇa cāsakṛt ||
Vāyu said: “Having censured the sons of Dhṛtarāṣṭra for their gambling, and then again—by words and by repeated secret counsel—having sown dissension among all the kings, he proceeded further.”
वायुदेव उवाच