(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३१६ श्लोक मिलाकर कुल ११६६ “लोक हैं।) > मत्त, उन्मत्त आदि दस प्रकारके अपराधियोंके नाम इस प्रकार हैं--१-मत्त, २-उन्मत्त, ३-दस्यु, ४-तस्कर, ५-प्रतारक, ६-शठ, ७-लम्पट, ८-जुआरी, ९-कृत्रिम लेखक (जालिया) और १०-घूसखोर। ३. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य--इन छ: आन्तरिक शत्रुओंके समुदायको षड्वर्ग कहते हैं। इनको पूर्णरूपसे जीत लेनेवाला नरेश ही सर्वत्र विजयी होता है। २. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण--इन पाँच इन्द्रियोंके समूहको ही पञ्चवर्ग कहते हैं। इन सबको क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--इन विषयोंमें आसक्त न होने देना ही इनपर विजय पाना है। ३. आखेट, जूआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन््दा करना, स्त्रियोंमें आसक्त होना, मद्य पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना--से कामजनित दस दोष हैं, जिनपर राजाको विजय पाना चाहिये। इनको सर्वथा त्याग देना ही इनपर विजय पाना है। ४. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता--ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष राजाके लिए त्याज्य हैं। ५, धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साहशक्ति, प्रभुशक्ति और मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं। ६. मन््त्री, राष्ट्र, दुरग, कोष और दण्ड--ये पाँच ही अपने और शत्रुवर्गके मिलाकर दस वर्ग कहलाते हैं। इनकी पूरी जानकारी रखनेपर राजाको अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका पूर्ण ज्ञान होता है। सप्ततितमो< ध्याय: राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन युधिछिर उवाच केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वर्तमानो महीपति: । सुखेनार्थान् सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्तुयात्,युधिष्ठिरने पूछा--आचारके ज्ञाता पितामह! किस प्रकारका आचरण करनेसे राजा इहलोक और परलोकमें भी भविष्यमें सुख देनेवाले पदार्थोको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है?
yudhiṣṭhira uvāca
kena vṛttena vṛttajña vartamāno mahīpatiḥ |
sukhena arthān sukhodarkān iha ca pretya cāpnuyāt ||
Yudhiṣṭhira said: “O grandsire, knower of right conduct—by what manner of living and disciplined behavior can a king, abiding in proper conduct, readily obtain those aims that yield happiness here in this world and also after death in the next?”
युधिछिर उवाच
The verse frames rājadharma as a disciplined way of life: a king’s true success is measured not only by immediate gains but by conduct that produces well-being both in this life and in the afterlife.
In Śānti Parva, Yudhiṣṭhira continues his inquiry to Bhīṣma, asking for practical guidance on what kind of personal and royal conduct enables a ruler to attain beneficial ends easily, with lasting happiness here and beyond death.