Yajña-bhāga-vyavasthā and the Pravṛtti–Nivṛtti Framework (यज्ञभागव्यवस्था तथा प्रवृत्तिनिवृत्तिधर्मविवेचनम्)
अपश्यद् भगवान् विष्णु: क्षिप्तं सासुरराक्षसम् । किं त्वत्र सुकृतं कार्य भवेदिति विचिन्तयन्,उनकी यह तिरस्कारपूर्ण घोषणा सुनकर सब लोग व्यथित हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे, “भला, कौन वीर इस शक्तिको उखाड़ सकता है?” उस समय भगवान् विष्णुने देखा कि सम्पूर्ण देवताओंकी इन्द्रियाँ और चित्त भयसे व्याकुल हैं तथा असुर और राक्षसों- सहित सम्पूर्ण जगतपर स्कन्दद्वारा आक्षेप किया गया है। यह देखकर वे सोचने लगे कि यहाँ क्या करना अच्छा होगा?
apāśyad bhagavān viṣṇuḥ kṣiptaṃ sāsura-rākṣasam | kiṃ tv atra sukṛtaṃ kāryaṃ bhaved iti vicintayan ||
Bhishma said: The Blessed Lord Vishnu observed that the whole world—together with the asuras and rakshasas—had been thrown into turmoil. Reflecting carefully, he considered: “What course of action here would be truly beneficial and rightly done?”
भीष्म उवाच