तरन्ति यतय: सिद्धा ज्ञानयानेन भारत । तीर्त्वातिदुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभ:,शत्रुसूदन! तदनन्तर वे सिद्ध यति प्रज्ञारूपी नौकाके द्वारा उस संसाररूपी घोर सागरको तर जाते हैं, जिसमें दुःखरूपी जल भरा है। चिन्ता और शोकके बड़े-बड़े कुण्ड हैं। नाना प्रकारके रोग और मृत्यु विशाल ग्राहोंके समान हैं। महान् भय ही महानागोंके समान हैं। तमोगुण कछुए और रजोगुण मछलियाँ हैं। स्नेह ही कीचड़ है। बुढ़ापा ही उससे पार होनेमें कठिनाई है। ज्ञान ही उसका द्वीप है। नाना प्रकारके कर्मोद्वारा वह अगाध बना हुआ है। सत्य ही उसका तीर है। नियम-व्रत आदि स्थिरता है। हिंसा ही उसका शीघ्रगामी महान् वेग है। वह नाना प्रकारके रसोंका भण्डार है। अनेक प्रकारकी प्रीतियाँ ही उस भवसागरके महारत्न हैं। दुःख और संताप ही वहाँकी वायु है। शोक और तृष्णाकी बड़ी-बड़ी भँवरें उठती रहती हैं। तीव्र व्याधियाँ उसके भीतर रहनेवाले महान् जलहस्ती हैं। हड्डियाँ ही उसके घाट हैं। कफ फेन हैं। दान मोतियोंकी राशि हैं। रक्त उसके कुण्डमें रहनेवाले मूँगा हैं। हँसना और चिल्लाना ही उस सागरकी गम्भीर गर्जना है। अनेक प्रकारके अज्ञान ही इसे अत्यन्त दुस्तर बनाये हुए हैं। रोदनजनित आँसू ही उसमें मलिन खारे जलके समान हैं। आसक्तियोंका त्याग ही उसमें परम आश्रय या दूसरा तट है। स्त्री-पुत्र जोंकके समान हैं। मित्र और बन्धु-बान्धव तटवर्ती नगर हैं। अहिंसा और सत्य उसकी सीमा हैं। प्राणोंका परित्याग ही उसकी उत्ताल तरंगें हैं। वेदान्तज्ञान द्वीप है। समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव इसकी जलराशि हैं। मोक्ष उसमें दुर्लभ विषय है और नाना प्रकारके संताप उस संसारसागरके बड़वानल हैं। भरतनन्दन! उससे पार होकर वे आकाशस्वरूप निर्मल परब्रह्ममें प्रवेश कर जाते हैं
taranti yatayaḥ siddhā jñānayānena bhārata | tīrtvātidustaraṃ janma viśanti vimalaṃ nabhaḥ ||
Bhīṣma said: “O Bhārata, perfected ascetics cross over this exceedingly hard-to-cross condition of embodied birth by the vehicle of knowledge. Having traversed it, they enter the stainless expanse of the sky—i.e., the pure, untainted state of Brahman.”
भीष्म उवाच
Liberation is attained by transcendent knowledge (jñāna): perfected ascetics use knowledge as the ‘vehicle’ to cross the difficult ocean-like condition of birth and enter the pure, limitless reality (Brahman), described metaphorically as the stainless sky.
In Śānti Parva, Bhīṣma instructs Yudhiṣṭhira on dharma and the path beyond suffering. Here he summarizes the culmination of the teaching: accomplished renouncers, through knowledge, pass beyond embodied existence and reach the pure state of ultimate reality.