Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
ऑपन--मा जल बछ। जज: एकाधिकंत्रेशततमो<ध्याय: सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन युधिछिर उवाच सम्यक् त्वया<यं नृपते वर्णित: शिष्टसम्मत: । योगमार्गो यथान्यायं शिष्यायेह हितैषिणा,युधिष्ठिरने कहा--महाराज! आप मेरे हितैषी हैं, आपने मुझ शिष्यके प्रति शिष्ट पुरुषोंके मतके अनुसार इस योगमार्गका यथोचितरूपसे वर्णन किया इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें यांख्यतत््वका वर्णणविषयक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥// ३०१ ॥। $. ज्ञानशक्ति, वैराग्य, स्वामिभाव, तप, सत्य, क्षमा, थैर्य, स्वच्छता, आत्माका बोध और अधिष्ठातृत्व--ये दस सात्त्विक गुण बताये गये हैं। २. असंतोष, पश्चात्ताप, शोक, लोभ, अक्षमा, दमन करनेकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध और ईर्ष्या-ये नौ राजस गुण बताये गये हैं। ३. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा, अभिमान, विषाद और प्रीतिका अभाव-ये आठ तामस गुण हैं। ४. महत्, अहंकार, शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्धतन्मात्रा-ये सात गुण बुद्धिके हैं। ३. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण-इन पाँच इन्द्रियोंसहित छठा मन-ये मनके छ: गुण हैं। २. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--ये आकाशके पाँच गुण हैं। ३. संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण-ये बुद्धिके चार गुण हैं। ४. अप्रतिपत्ति, विप्रतिपत्ति और विपरीत प्रतिपत्ति-ये तीन गुण तमके हैं। ५. प्रवृत्ति तथा दुःख--ये दो गुण रजके हैं। ६. प्रकाश सत्त्वका एक प्रधान गुण है। द्र्याधिकत्रिशततमो<ध्याय: वसिष्ठ और करालजनकका संवाद--क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति युधिछिर उवाच कि तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते पुन: । कि च तत्क्षरमित्युक्त यस्मादावर्तते पुन:
yudhiṣṭhira uvāca: ki tad akṣaram ity uktaṁ yasmān nāvartate punaḥ? ki ca tat kṣaram ity uktaṁ yasmād āvartate punaḥ?
Yudhiṣṭhira said: “What is that which is called the Imperishable—knowing which one does not return again? And what is that which is called the Perishable—because of which one returns again?”
युधिछिर उवाच
The verse frames a key liberation inquiry: distinguishing the imperishable (akṣara)—that knowledge of which ends rebirth—from the perishable (kṣara), attachment to which sustains return to saṁsāra. It sets up a metaphysical and soteriological contrast central to Sāṅkhya-Yoga discussions in the Mokṣa-dharma section.
In the Mokṣa-dharma discourse of Śānti Parva, Yudhiṣṭhira, as a student seeking release and clarity, asks his teacher to define two fundamental categories—akṣara and kṣara—and to explain why one leads beyond return while the other leads to repeated return.