धर्मलक्षण-प्रश्नः (Marks and Sources of Dharma) | Chapter 251: Inquiry into the Definition of Dharma
ऑपन- मा बछ। -्स:ॉ् द्विपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान व्यास उवाच दन्द्वानि मोक्षजिज्ञासुरर्थधर्मावनुछित: । वक्त्रा गुणवता शिष्य: श्राव्य: पूर्वमिदं महत्,व्यासजी कहते हैं--बेटा! जो अर्थ और धर्मका अनुष्ठान करके सुख-दुःख आदि द्न्द्दोंकोी धैर्यपूर्वक सहता हो और मोक्षकी जिज्ञासा रखता हो, उस श्रद्धालु शिष्यको गुणवान् वक्ता पहले इस महत्त्वपूर्ण अध्यात्म-शास्त्रका श्रवण कराये इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २५२ ॥/ नऔहा-<> 7 त्रिपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे भिन्न जीवात्माका और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार करनेका प्रकार व्यास उवाच शरीराद् विप्रमुक्त हि सूक्ष्मभूतं शरीरिणम् | कर्मभि: परिपश्यन्ति शास्त्रोक्तै: शास्त्रवेदिन:
vyāsa uvāca | śarīrād vipramuktaṃ hi sūkṣmabhūtaṃ śarīriṇam | karmabhiḥ paripaśyanti śāstroktaiḥ śāstravedinaḥ ||
Vyāsa said: “My son, one who duly practices artha and dharma, who steadfastly endures the pairs of opposites—pleasure and pain—and who longs to know mokṣa: to such a faithful disciple a teacher endowed with virtue should first cause this great spiritual doctrine to be heard.”
व्यास उवाच