Brahmacarya-Upāya: Jñāna, Śauca, and the Mind’s Role in Desire (शान्ति पर्व, अध्याय २०७)
(तप: स्वरूपो महादेव: कृष्णो देवकिनन्दन: । तस्य प्रसादाद् दुःखस्य नाशं प्राप्स्यसि मानद ।। एक: कर्ता स कृष्णश्न ज्ञानिनां परमा गति: । सबको मान देनेवाले नरेश! महान् देवता भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्ण तपस्यारूप ही हैं। उन्हींकी कृपासे तुम्हारे सारे दुःखोंका नाश हो जायगा। एकमात्र जगत्स्रष्टा श्रीकृष्ण ज्ञानियोंकी परमगति हैं ।। इदमाश्रित्य देवेन्द्रो देवा रुद्रास्तथाश्विनौ ।। स्वे स्वे पदे विविशिरे भुक्तिमुक्तिविदो जना: । तपस्यारूप इन श्रीकृष्णका आश्रय लेकर देवराज इन्द्र अन्यान्य देवता, रुद्रगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा भोग और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले महर्षि अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित रहते हैं ।। श्रूयतामस्य सद्भाव: सम्यग्ज्ञानं यथा तव | भूतानामन्तरात्मासौ स नित्यपदसंवृतः ।। वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं तथा नित्य वैकुण्ठधाममें अपनी योगमायासे आवृत होकर निवास करते हैं। उनकी सत्ता और महत्ताको तुम श्रवण करो, जिससे तुम्हें श्रीकृष्णतत्त्वका ज्ञान हो जाय ।। पुरा देवऋषि: श्रीमान् नारद: परमार्थवान् | चचार पृथिवीं कृत्स्नां तीर्थान्यनुचरन् प्रभु: ।। पहलेकी बात है परमार्थसे सम्पन्न देवर्षि श्रीनारदजी भूमण्डलके सम्पूर्ण तीर्थोमें विचरण करते हुए घूम रहे थे ।। हिमवत्पादमश्रित्य विचार्य च पुन: पुनः । स ददर्श ह्वदं तत्र पद्चोत्पलसमाकुलम् ।। वे हिमालयके समीपवर्ती पर्वतपर बारंबार विचरण करके एक ऐसे स्थानपर गये, जहाँ उन्हें कमल और उत्पलसे भरा हुआ एक सरोवर दिखायी दिया ।। ततः स्नात्वा महातेजा वाग्यतो नियतेन्द्रिय: । तुष्टाव पुरुषव्याप्रो जिज्ञासुश्च॒ तदद्भुतम् ।। तत्पश्चात् महातेजस्वी पुरुषप्रवर नारदने उस सरोवरमें मौनभावसे स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर उस भगवानके स्वरूपका अदभुत रहस्य जाननेके लिये भगवानकी स्तुति की ।। ततो वर्षशते पूर्ण भगवॉल्लोकभावन: । प्रादुक्षकार विश्वात्मा ऋषे: परमसौहृदात् ।। तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकस्रष्टा विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ऋषिके प्रति परम सौहार्दवश उनके सामने प्रकट हुए ।। तमागतं जगजन्नाथं सर्वकारणकारणम् | अखिलामरमौल्यज्ररुक्मारुणपदद्वयम् ।। वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् । पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ।। श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तु भकन्धरम् । मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ।। नम्नचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् । नानारत्नमणिवजस्फुरन्मकरकुण्डलम् ।। इन्द्रनीलनिभाभ॑ तं॑ केयूरमुकुटोज्ज्वलम् । देवैरिन्द्रपुरोगैश्न ऋषिसड्चैरभिष्ठतम् ।। नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् | नारदजीने देखा, समस्त कारणोंके भी कारण भगवान् जगन्नाथ पधारे हैं। उनके युगल चरणारविन्द सम्पूर्ण देवताओंके सुवर्णमय मुकुटोंके कुंकुमसे रक्तवर्ण हो रहे हैं। गरुड़जीके ऊपर सवारी करनेसे उनके दोनों घुटनोंमें रगड़ पड़नेके कारण चिह्न बन गये हैं; जो उन घुटनोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्यामसुन्दर अंगपर पीताम्बर शोभा पा रहा है और कटिप्रदेशमें किंकिणीकी लड़ें बँधी हुई हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा शोभा पाती है। गलेमें मनोहर कौस्तुभभमणि अपना प्रकाश बिखेर रही है। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी मनोहर छटा छा रही है। विशाल नेत्र चंचल गतिसे इधर-उधर देख रहे हैं। झुके हुए दो धनुषोंकी भाँति बाँकी भौंहें उनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकारके रत्न, मणि और हीरोंसे जटित मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। उनकी अंगकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। बाँहोंमें केयूर तथा मस्तकपर मुकुटकी उज्ज्वल आभा छिटक रही है एवं इन्द्र आदि देवता और महर्षियोंके समुदाय उनकी स्तुति करते हैं। भगवानकी यह झाँकी देखकर जय-जयकार करते हुए नारदजीने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ।। ततः स भगवान् श्रीमान् मेघगम्भीरया गिर: । प्राहेश: सर्वभूतानां नारद पतितं क्षितौ ।। तदनन्तर नारदजीको पृथ्वीपर पड़ा देख सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीमान् भगवान् नारायणने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ।। श्रीभगवानुवाच भद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत । यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत्ू ।। श्रीभगवान् बोले--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हुई हो, उसे स्पष्ट बताओ। मैं उसे पूर्ण करूँगा ।। भीष्म उवाच स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनि: । प्रोवाच हृदि संरूढं शड्खचक्रगदाधरम् ।। विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत । तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! प्रेमसे आतुर हुए मुनिवर नारदने जय-जयकार करते हुए अपने हृदयमें नित्य विराजमान रहनेवाले शंख, चक्र और गदाधारी भगवानसे कहा --'प्रभो! प्रसन्न होइये। जगन्नाथ! अच्युत! हृषीकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह आपको पहलेसे ही ज्ञात है। मैं उसीको सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर कृपा करें” ।। ततः स्मयन् महाविष्णुरभ्य भाषत नारदम् | निर्दन्द्धा निरहड्कारा: शुचय: शुद्धलोचना: ।। ते मां पश्यन्ति सततं तान् पृच्छ यदिहेच्छसि । तब मुसकराते हुए भगवान् महाविष्णुने नारदजीसे कहा--“जो लोग शीत, उष्ण आदि द्न्द्दोंसे रहित, अहंकारशून्य, पवित्र तथा निर्दोष दृष्टिवाले महात्मा हैं वे निरन्तर मेरे उस स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं; अतः तुम यहाँ जो कुछ चाहते हो, उसके विषयमें उन्हीं महात्माओंके पास जाकर प्रश्न करो ।। ये योगिनो महाप्राज्ञा मंशा ये व्यवस्थिता: । तेषां प्रसाद॑ देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ।। *देवर्ष!ी जो लोग योगी और महाज्ञानी हैं; तथा जो मेरे अंशरूपसे स्थित हैं, उनके प्रसादको तुम मेरा ही कृपाप्रसाद समझो” ।। इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान् भूतभावन: । तस्माद् ब्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ।। ऐसा कहकर भूतभावन भगवान् विष्णु वहाँसे चले गये; अतः युधिष्ठिर! तुम भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी शरणमें जाओ ।। एतमाराध्य गोविन्द गता मुक्ति महर्षय: । एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ।। इन भगवान् गोविन्दकी आराधना करके कितने ही महर्षि मुक्तिको प्राप्त हो गये हैं। ये ही जगतके सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता और समस्त कारणोंके भी कारण हैं ।। मयाप्येतच्छुतं राजन् नारदात्तु निबोध तत् । स्वयमेव समाचष्ट नारदो भगवान् मुनि: ।। राजन! मैंने भी यह बात नारदजीसे ही सुनी है। तुम भी उनके मुखसे सुन सकते हो। भगवान् नारदमुनिने स्वयं ही यह बात मुझसे कही थी ।। समस्तसंसारविघातकारणं भजन्ति ये विष्णुमनन्यमानसा: । ते यान्ति सायुज्यमतीव दुर्लभ इतीव नित्यं हृदि वर्णयन्ति ।।) जो समस्त संसार-बन्धनकी निवृत्तिके कारणभूत भगवान् विष्णुकी अनन्य चित्तसे आराधना करते हैं, वे अत्यन्त दुर्लभ सायुज्य मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह बात सदा मेरे हृदयमें बनी रहती है तथा ऋषिलोग भी इसका वर्णन करते हैं ।। देवं देवर्षिराचष्ट नारद: सर्वलोकदूक्,सम्पूर्ण जगत्को देखनेवाले देवर्षि नारदने भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन किया था
tapaḥ-svarūpo mahādevaḥ kṛṣṇo devakīnandanaḥ | tasya prasādād duḥkhasya nāśaṃ prāpsyasi mānada || ekaḥ kartā sa kṛṣṇaś ca jñānināṃ paramā gatiḥ ||
Bhishma said: O king who honors all, Devakī’s son Śrī Kṛṣṇa—who is Himself the very form of austerity and the supreme Lord—will, by His grace, bring about the destruction of your sorrow. He alone is the true doer, and that Kṛṣṇa is the highest goal of the wise. (Bhishma then frames this as a received teaching, recalling how Nārada once praised the Lord and was instructed that the pure, egoless sages who behold Him are to be approached—thereby urging Yudhiṣṭhira to take refuge in Kṛṣṇa as the ultimate cause and liberator.)
भीष्म उवाच