पश्य प्रह्याद संयोगान् विप्रयोगपरायणान् । संचयांश्व विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः,'प्रह्माद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोगमें ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाशमें ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता हूँ
“See, Prahrada: all unions end in separation, and all accumulations end in destruction. Seeing this, I set my mind on nothing, nowhere.”
भीष्म उवाच